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क्या सरकार की आलोचना पर दर्ज हो सकता है केस, सोशल मीडिया पर आपकी आजादी कहां खत्म होती है? जानिए एक्सपर्ट्स की राय

क्या सरकार या किसी नेता की आलोचना करने पर मामला दर्ज हो सकता है? फर्जी वीडियो या मीम साझा करने पर कानून क्या कहता है?

By Kuldeep BhawsarEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Thu, 30 Jul 2026 06:42:28 PM (IST)Updated Date: Thu, 30 Jul 2026 06:42:27 PM (IST)
क्या सरकार की आलोचना पर दर्ज हो सकता है केस, सोशल मीडिया पर आपकी आजादी कहां खत्म होती है? जानिए एक्सपर्ट्स की राय

HighLights

  1. सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं
  2. डीपफेक और एआई कंटेंट पर कितना सख्त है कानून
  3. सोशल मीडिया पोस्ट और मानहानि के बीच का फर्क

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। प्रधानमंत्री और अन्य सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक और एआई आधारित कंटेंट को लेकर हाल में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद एक सवाल फिर चर्चा में है - क्या सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखना अभिव्यक्ति की आजादी है?

क्या सरकार या किसी नेता की आलोचना करने पर मामला दर्ज हो सकता है? फर्जी वीडियो या मीम साझा करने पर कानून क्या कहता है? नईदुनिया ने विशेषज्ञों से बात कर इन्हीं सवालों के स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब जानने की कोशिश की।


सबसे पहले समझिए: संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यानी आप अपनी राय रख सकते हैं, सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं और लोकतांत्रिक बहस में हिस्सा ले सकते हैं।

लेकिन यही अधिकार अनुच्छेद 19(2) के तहत कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन है। ये प्रतिबंध भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी देशों से संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता, अदालत की अवमानना, मानहानि तथा अपराध के लिए उकसाने जैसे मामलों में लगाए जा सकते हैं।

आलोचना और मानहानि में क्या अंतर है?

किसी सरकारी फैसले, नीति या जनप्रतिनिधि के कामकाज पर तथ्य आधारित आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति के बारे में बिना प्रमाण झूठे आरोप लगाए जाएं या ऐसी सामग्री प्रकाशित की जाए जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे, तो यह मानहानि का मामला बन सकता है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2016 के एक मामले में आपराधिक मानहानि के प्रावधानों को वैध माना था।

क्या केवल आपत्तिजनक पोस्ट करना अपराध है?

केवल आपत्तिजनक पोस्ट करना अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए को असंवैधानिक घोषित करते हुए स्पष्ट किया था कि केवल किसी पोस्ट का आपत्तिजनक या कष्टदायक होना उसे स्वतः अपराध नहीं बनाता।

हालांकि यदि कोई पोस्ट हिंसा भड़काने, नफरत फैलाने, अपराध के लिए उकसाने या कानून व्यवस्था बिगाड़ने से जुड़ी हो, तो अन्य लागू कानूनों के तहत कार्रवाई हो सकती है।

डीपफेक और एआई कंटेंट पर क्या नियम हैं?

किसी व्यक्ति का फर्जी वीडियो, बदली हुई आवाज या एआई से तैयार ऐसा कंटेंट, जिससे लोगों को भ्रमित किया जाए या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे, कानूनी जांच का विषय बन सकता है।

केंद्र सरकार समय-समय पर सोशल मीडिया मंचों को डीपफेक और भ्रामक एआई सामग्री के खिलाफ कार्रवाई के लिए एडवाइजरी जारी कर चुकी है। ऐसे मामलों में अन्य लागू आपराधिक और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी कानून भी लागू हो सकते हैं।

ध्यान रखने योग्य बातें

याद रखें सरकार की आलोचना करना अपने आप में अपराध नहीं है। तथ्य और राय में अंतर बनाए रखें। बिना पुष्टि के फोटो, वीडियो या स्क्रीनशॉट साझा करने से बचें। फर्जी या बदले हुए एआई कंटेंट को आगे भेजना भी जोखिम पैदा कर सकता है। कोई भी पोस्ट वायरल होने से पहले आपकी जिम्मेदारी होती है।

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बगैर पुष्टि फॉरवर्ड करना बढ़ाएगा परेशानी

किसी भी पोस्ट, वीडियो, फोटो इत्यादि को फॉरवर्ड करने से पहले उसकी पुष्टि जरूरी है। बगैर पुष्टि के इन्हें फारवर्ड करना आपकी परेशानी बढ़ा सकता है। यह भी ध्यान रखें कि किसी का फर्जी वीडियो या एआई से तैयार ऐसा कंटेट जो भ्रमित कर रहा है फॉरवर्ड करना भी आपकी परेशानी बढ़ाएगा।- अभिजीत सिंह राठौर, लोक अभियोजक इंदौर जिला न्यायालय

किसी व्यक्ति के बारे में बगैर प्रमाण झूठे आरोप लगाए जाना या ऐसी सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करना जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे मानहानि है। हालांकि किसी जन प्रतिनिधि के कामकाज पर तथ्य आधारित आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन ध्यान रखें यह तथ्य आधारित होना चाहिए।- अजय बागडिया, वरिष्ठ अधिवक्ता, इंदौर