
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। धार भोजशाला मामले में सोमवार से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने तर्क रखना शुरू किया। एडिशनल सालिसिटर जनरल वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने कोर्ट को बताया कि पिछले 124 वर्ष में भोजशाला का कई बार सर्वे हो चुका है। एएसआइ ने वर्ष 1902-03 में भोजशाला का सर्वे किया था। इसके अलावा भी निजी स्तर पर कई अन्य सर्वे हुए। एएसआइ सहित सभी सर्वे में भोजशाला से मूर्तियां और पत्थरों पर संस्कृत में लिखे श्लोक मिले हैं। कोर्ट ने वर्ष 2024 में एएसआइ को अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए सर्वे के लिए आदेशित किया गया था। इसकी रिपोर्ट प्रस्तुत की जा चुकी है। पूर्व के सर्वे की तरह इस बार भी सर्वे में मूर्तियां और संस्कृत में लिखे श्लोक मिले हैं।
एडवोकेट जैन ने कहा कि कोर्ट ने आदेश में स्पष्ट कहा था कि वर्तमान परिसर को किसी तरह का नुकसान पहुंचाए बगैर, मूल स्वरूप में बदलाव करे बगैर सर्वे किया जाए। इसके बाद दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के सामने सर्वे शुरू किया गया। 98 दिन चले सर्वे में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया है। एडवोकेट जैन ने उन पुस्तकों का उल्लेख भी किया जिनमें भोजशाला के इतिहास की जानकारी दी गई है। एएसआइ की ओर से बताया गया कि भोजशाला को वर्ष 1908 में ही पुरातत्व महत्व की इमारतों की सूची में शामिल कर लिया गया था। वर्ष 1958 में इसे संरक्षित भवन की सूची में शामिल किया गया।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया कि भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद का नाम किस दस्तावेज में सबसे पहले आया, क्या इस बारे में कभी कोई नोटिफिकेशन जारी हुआ था। इस पर ऑनलाइन जुड़े हिंदू फ्रंट फार जस्टिस के वकील ने बताया कि वर्ष 2003 में प्रस्तुत एक याचिका में इसका उल्लेख किया गया था। एएसआइ की ओर से इस संबंध में वर्ष 1958 में जारी गजट का उल्लेख किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन मंगलवार को एएसआइ द्वारा हाल ही में किए गए 98 दिन लंबे सर्वे की रिपोर्ट के बारे में तर्क रखेंगे। वे कोर्ट को बताएंगे कि 98 दिन चले सर्वे में एएसआइ को भोजशाला में क्या-क्या मिला। एएसआइ की ओर से तर्क पूरे होने के बाद मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद तर्क रखेंगे।
याचिकाओं में इंटरविनर बने धार निवासी जिब्रान अंसारी, फिरोज और अयाज की ओर से शनिवार को तर्क अधूरे रहे थे। सोमवार को उनके वकील सैय्यद अशहर अली वारसी ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मंदिर के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है शिखर, गोपुरम, मंडप, गर्भगृह, लेकिन भोजशाला निर्माण में ये हैं ही नहीं। मस्जिद के लिए जरूरी किबला जिसकी दीवार मक्का की ओर हो वह यहां मौजूद है। इसके अलावा मेहराब, सहन यानी वो खुला आंगन जहां नमाज पढ़ी जाती है वह भी मौजूद है। वजू करने के लिए जरूरी पानी के सोते सहित इमाम का मिंबर भी यहां है जो बताते हैं कि यह मस्जिद ही थी।
उन्होंने कहा कि यहां पूर्व में भी नमाज होती रही है। पुराने दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां मस्जिद होने का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि पूर्व में राजा भोज द्वारा मंदिर का निर्माण करने के लिए जो तथ्य कोर्ट के सामने रखे गए हैं उनका कोई प्रमाणित दस्तावेज या शपथ पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है। उन्होंने वर्ष 1935 में धार रियासत के गजट के साथ ही 1952 में जारी एएसआइ कमिश्नर की रिपोर्ट का हवाला भी दिया।
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