
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : यूपीआई से भुगतान पर टैक्स (लेवी) लगाने के सरकार के प्रस्ताव से रिटेल बाजार और व्यापारी चिंता मेें हैं। हालांकि थोक बाजार का रवैया इससे उलट नजर आ रहा है।
दरअसल रिटेल मार्केट में चिंता है कि सरकार ऐन त्योहारों के पहले नियम संशोधन कर रही है। अब त्योहार के पहले इसे लागू कर दिया तो बाजार में त्योहारी बिक्री प्रभावित होगी। थोक बाजार इससे इत्तेफाक नहीं रखता। थोक व्यापारी सरकार के नियम में नकदी प्रवाह बढ़ने के मौके के रूप में देख रहे हैं। हालांकि वित्त विश्लेषक इसके असर को बाजार के लिए ठीक नहीं मान रहे।
यूपीआई ट्रांजेक्शन पर लेवी या टैक्स कब से लगेगा यह अभी तय नहीं है। वित्त विश्लेषक व कंपनी सेक्रेटरी महेश नटानी कहते हैं कि बीते कुछ वर्षों में आम भारतीय उपभोक्ता की कैश रखने की आदत तेजी से बदली है। युवाओं में तो 80 प्रतिशत से ज्यादा कैशलैस खरीदी करने लगे हैं। बढ़ी आयुवर्ग में भी यह आदत काफी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में बाजार का आर्थिक संव्यवहार और लेन-देन पूरी तरह यूपीआई आधारित ट्रांजेक्शन पर निर्भर हो गया है।
अब यदि अचानक बैंक ट्रांजेक्शन पर टैक्स लगाते हैं तो इससे यूपीआई का उपयोग घटेगा। इसे उसी तरह देखना चाहिए जैसे बीते वर्षों में एटीएम से नकदी निकालने की संख्या सीमित करने और अतिरिक्त नकदी निकासी पर शुल्क वसूलने का नियम लागू हुआ। इसके बाद लोगों ने एटीएम जाना कम किया और कई एटीएम बंद भी हो गए।
आगे यूपीआई के प्रयोग में भी यह स्थिति देखी जा सकती है। इसके असल से लोगों की क्रय शक्ति घटेगी। क्योंकि वे टैक्स या शुल्क के डर से खर्च करने की आदत में कमी लाएंगे। बाजार की ताजा स्थिति में ऐसा कोई भी कदम बाजार में बिक्री को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकता है। और तो और ऑनलाइन खरीदी की आदत भी इससे प्रभावित होगी। सीधे तौर पर सरकार का यह कदम क्रेडिट और डेबिट कार्ड के प्रचलन को प्रोत्साहित करने की कोशिश है, जिसका लाभ विदेशी कंपनियों को मिलेगा।
डिजिटल लेन-देन में भले बिजनेस-टू-बिजनेस पर लगे या रिटेल लेन-देन पर इसका सीधा असर केवल व्यापारी की जेब पर नहीं पड़ेगा, बल्कि इसकी लागत पूरी सप्लाई चेन में आगे बढ़ते हुए अंततः उपभोक्ता तक ही पहुंचेगी।
इंदौर रिटेल रेडीमेड गारमेंट व्यापारी एसोसिएशन के अध्यक्ष अक्षय जैन ने कहा कि वर्तमान समय में व्यापार का बड़ा हिस्सा डिजिटल भुगतान पर निर्भर है। गारमेंट्स कारोबार में रिटेलर को नियमित रूप से सप्लायर और थोक विक्रेताओं को बड़ी राशि का भुगतान करना पड़ता है।
यदि ऐसे बीटूबी डिजिटल भुगतान पर एमडीआर या अन्य शुल्क लागू होता है तो यह व्यापारी की वास्तविक कारोबारी लागत में जुड़ जाएगा। मान लें किसी गारमेंट व्यापारी को सप्लायर को 10 लाख का यूपीआइ भुगतान करना है और उस पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगता है, तो व्यापारी को लगभग 4,000 अतिरिक्त लागत वहन करनी होगी।
जिन व्यापारियों का सालाना कारोबार करोड़ों रुपये में है, उनके लिए यह राशि हजारों से बढ़कर लाखों रुपये तक पहुंच सकती है। डिजिटल माध्यम से व्यापारिक भुगतान करने वाले कारोबारियों पर अतिरिक्त लागत डालने के बजाय कम लागत या शून्य लागत वाले डिजिटल भुगतान तंत्र को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
थोक बाजार नकदी की कमी से जूझ रहा है। दि सियागंज होलसेल किराना मर्चेंट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष नईम पालवाला कहते हैं थोक बाजार पर यूपीआई भुगतान शुल्क का खास असर नहीं होगा। हम मान रहे हैं कि इससे बाजार को लाभ ही होगा।
पालवाला के अनुसार थोक कारोबारी आपस में भुगतान के लिए चेक और आरटीजीएस जैसे बैंकिंग ट्रांजेक्शन माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं। जो छोटे रिटेल ग्राहक हैं वे ही यूपीआइ का उपयोग करते हैं। बीते वर्षों में इस आदत के कारण बाजार में नकदी की कमी देखी जा रही है। ज्यादातर काउंटरों पर नकदी किल्लत नजर आती है।
सरकार का कदम फिर से नकदी प्रवाह हो बढ़ावा देगा और लोग बाजार में नकद खर्च करने लगेंगे। डिस्काउंट या स्कीम के चक्कर में परंपरागत बाजारों से जो छोटे ग्राहक सुपर स्टोर की ओर गए हैं वे भी बाजार में लौटेंगे। क्योंकि वहां पर डिजिटल पेमेंट पर उन्हें शुल्क देना पड़ेगा।
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