
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने दुष्कर्म पीडित 16 वर्षीय किशोरी को गर्भपात की अनुमत्ति प्रदान की है। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीडित 26 सप्ताह की गर्भवती है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि पीड़ित और उसके माता-पिता बच्चे के जीवित पैदा होने पर उसे साथ रखने के लिए तैयार नहीं हैं, तो उसे जन्म की तारीख से 15 दिन बाद राज्य अधिकारियों या सीडब्ल्यूसी को सौंप सकते हैं।
सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि पीडित के पिता ने एडिशनल सेशंस जज शहडोल के सामने प्रेग्नेंसी खत्म करने के लिए आवेदन किया है। पीड़िता रेप पीडित है और पिता प्रेग्नेंसी खत्म करना चाहते हैं। हाई कोर्ट ने याचिका की सुनवाई करते हुए पीडित की मेडिकल जांच रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे।
मेडिकल बोर्ड की तरफ से पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया कि पीड़ित 26 हफ्ते की प्रेग्नेंट है और उसे खत्म की जा सकती है। यह रिपोर्ट सात डाॅक्टरों की एक टीम द्वारा जांच और डायग्नोसिस के बाद दी गई है, जिसमें दो गाइनेकोलाजिस्ट है। परिवार व पीड़िता को गर्भपात के दौरान होने वाले खतरे के संबंध में जानकारी दी गयी है।
परिवार तथा पीड़ित प्रेगनेंसी खत्म करने के लिए सहमति दी है। मेडिकल ऑफिसर ने ब्लड की सोनोग्राफी और डायग्नोसिस रिपोर्ट और दूसरी संबंधित जांच की है। राज्य के की ओर से अनुमति मांगी गयी कि हाॅस्पिटल को रेप पीडित की प्रेगनेंसी खत्म करने का निर्देश दिया जाए।
कोर्ट ने पीड़िता की प्रेग्नेंसी को खत्म करने की इजाजत देते हुए अपने आदेश में कहा है कि पीड़िता अपने माता-पिता के साथ जल्द से जल्द मेडिकल बोर्ड द्वारा तय समय पर अस्पताल में उपस्थित रहें। डाक्टरों की एक स्पेशल टीम प्रेग्नेंसी को खत्म करने के बारे में फैसला लेते हुए जल्द से जल्द उसे समाप्त करें।
पूरी कार्यवाही डाक्टरों की एक्सपर्ट टीम की मौजूदगी में किया जाएगा। प्रेग्नेंसी खत्म करते समय डाक्टर पूरी सावधानी बरतेंगे और पीड़ित को सभी मेडिकल सुविधा प्रदान की जाए। बच्चा जिंदा पैदा होता है, तो उसकी देखभाल करना राज्य सरकार की ड्यूटी होगी।
डाॅक्टर यह सुनिश्चित करें की भ्रूण या बच्चे का एक सैंपल जांच के लिए सुरक्षित रखा जाए और आरोपी पर आगे की जांच और मुकदमा चलाने के लिए तुरंत जांच अधिकारी को सौंप दिया जाए।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि यह भी साफ़ किया जाता है कि अगर पीड़ित और उसके माता-पिता ज़िंदा पैदा हुए बच्चे को रखने के लिए तैयार नहीं हैं, तो वे बच्चे को उसके जन्म की तारीख से 15 दिन बाद राज्य अधिकारियों या सीडब्ल्यूसी को सौंप सकते हैं।
बच्चा जिंदा पैदा होता है तो वह 15 दिन तक मां के पास रहेगा। जुवेनाइल केयर एंड प्रोटेक्शन एक्ट और राज्य या केंद्र सरकार द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों और दूसरी गाइडलाइंस के अनुसार बच्चे को किसी भी इच्छुक परिवार को गोद देने के लिए स्वतंत्र होगी।