
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद अब याचिका की तकनीकी खामियों को लेकर चर्चा में है।
राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है। एसोसिएशन के अनुसार, याचिका डायरी क्रमांक 65767/2026 में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने 22 अक्टूबर को 10 डिफाल्ट चिह्नित किए। इस बीच मामले में तीन कैविएट दाखिल किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने 26 अक्टूबर को जारी पत्र में कहा कि सरकार की अपील दाखिल होने के बाद से ही डिफाल्ट में है।
उनके अनुसार, रजिस्ट्री ने याचिका, आवेदनों और संलग्न दस्तावेजों को स्पष्ट, पठनीय तथा कागज के एक तरफ डबल स्पेस में टाइप करने संबंधी आपत्तियां दर्ज की हैं। एसोसिएशन का आरोप है कि सरकार ने अब तक इन कमियों को दूर करने के लिए प्रभावी पहल नहीं की है।
मामले में यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन, सत्यम नंदन और रितु बड़ोले की ओर से कैविएट दाखिल किए जाने की जानकारी सामने आई है। कैविएट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण संबंधी फैसले पर रोक लगाने या अंतरिम आदेश पारित करने से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर मिले।
रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कहा कि सरकार को हाई कोर्ट के फैसले का स्वतंत्र विधि विशेषज्ञों से अध्ययन कराकर पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर नया कानून बनाने पर विचार करना चाहिए।
आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में अपील करने से ओबीसी आरक्षण का मुद्दा लंबा खिंचने की आशंका है। एसोसिएशन ने सरकार को विधायी और संवैधानिक विकल्प अपनाने की सलाह दी है।
हाई कोर्ट ने नौ अक्टूबर 2026 को 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण संबंधी प्रावधान को असंवैधानिक ठहराते हुए 14 प्रतिशत आरक्षण लागू रखने के निर्देश दिए थे।
13 प्रतिशत रोके गए पदों को अनारक्षित वर्ग से भरने की प्रक्रिया तीन महीने में पूरी करने को कहा था। अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका की आगे की प्रक्रिया रजिस्ट्री की आपत्तियां दूर किए जाने और मामले की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने पर निर्भर करेगी।
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