
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाइकोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने कर्मचारी संघ के पदाधिकारी होने के आधार पर वर्षों तक तबादले से छूट पाने वाले एक प्राध्यापक को राहत नहीं दी है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के विरुद्ध अमर्यादित भाषा के प्रयोग पर अदालत ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पर 10 हजार का जुर्माना लगा दिया है। कोर्ट ने आदेश में साफ किया कि स्थानांतरण सरकारी सेवा का सामान्य हिस्सा है और कार्यकाल पूरा होने के बाद कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पर बने रहने का अधिकार नहीं जता सकता।
हाई कोर्ट ने डा. एमयू सिद्दीकी की वह याचिका निरस्त कर दी है, जिसमें उन्होंने सिंगरौली के शासकीय राजनारायण स्मृति महाविद्यालय बैढ़न से कटनी जिले के बहोरीबंद महाविद्यालय किए गए तबादले को चुनौती दी थी।
अदालत ने पाया कि इन्हीं कारणों से उन्हें पूर्व में चार वर्षों तक स्थानांतरण से छूट मिल चुकी थी और यह अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। महाविद्यालय में शिक्षण व्यवस्था कैसे संचालित होगी और किस अधिकारी को प्रतिस्थापित किया जाएगा, यह प्रशासनिक निर्णय का विषय है।
कोर्ट ने कहा कि तबादला आदेश से याचिकाकर्ता के किसी वैधानिक या मौलिक अधिकार का हनन नहीं हुआ है। न तो स्थानांतरण नीति के उल्लंघन का कोई प्रमाण है और न ही कोई प्रतिकूल नागरिक परिणाम सामने आया है। ऐसे मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप अपवाद स्वरूप ही संभव है।
आदेश में कोर्ट ने विशेष टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने राज्य सरकार के विरुद्ध अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया और अनावश्यक रूप से विवाद को अदालत तक खींचा। इसे अनुचित मानते हुए अधिवक्ता पर 10 हजार का जुर्माना लगाया गया, जो 30 दिन के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करना होगा।
ट्रांसफर कोई दंड नहीं, प्रशासनिक आवश्यकता है और अदालतें तब तक हस्तक्षेप नहीं करेंगी, जब तक स्पष्ट वैधानिक उल्लंघन सिद्ध न हो।
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