
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ के समक्ष डाक्टरों की वरिष्ठता, नियमितीकरण और पदोन्नति में कथित भेदभाव के मामले की सुनवाई हुई। खंडवा निवासी डॉ. सोमपाल सिंह ने याचिका में आरोप लगाया है कि वर्ष 1991 में पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद उनकी नियमित सेवा वर्ष 1994 से मानी गई।
दूसरी ओर, पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं करने वाले डा. अविनाश दुबे को वर्ष 1989 से नियमित सेवा का लाभ देकर वरिष्ठता में आगे कर दिया गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि इसी वरिष्ठता के आधार पर डा. दुबे वर्ष 2006 में प्रोफेसर पद पर पदोन्नत हो गए, जबकि उन्हें समान लाभ नहीं मिला। कोर्ट ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य सरकार, पीएससी सहित संबंधित अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आयुष प्रजापति ने पक्ष रखा।
याचिका के अनुसार डॉ. सोमपाल सिंह ने वर्ष 1991 में पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसके बावजूद उनकी नियमित सेवा की गणना वर्ष 1994 से की गई। उनका कहना है कि इससे उनकी वरिष्ठता प्रभावित हुई और आगे पदोन्नति में भी नुकसान उठाना पड़ा।
याचिका में डॉ. अविनाश दुबे का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि उन्होंने पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी। इसके बावजूद विभाग ने उनकी वर्ष 1989 की जॉइनिंग से नियमित सेवा का लाभ दिया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि समान परिस्थितियों में अलग-अलग सेवा लाभ देना भेदभावपूर्ण है।
डॉ. सोमपाल सिंह के अनुसार वरिष्ठता में बने अंतर का परिणाम पदोन्नति में भी सामने आया। उनका दावा है कि डॉ. अविनाश दुबे को वर्ष 2006 में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति मिल गई, जबकि पीएससी उत्तीर्ण होने के बावजूद उन्हें यह लाभ नहीं दिया गया।
याचिका में विभागीय कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के विपरीत बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि समान परिस्थितियों में अलग-अलग व्यवहार से समानता और सरकारी सेवा में अवसर की समानता के अधिकार प्रभावित हुए। डॉ. सोमपाल सिंह ने मांग की है कि उनकी नियमित सेवा वर्ष 1989 से मानी जाए और उसी आधार पर वरिष्ठता का लाभ दिया जाए। साथ ही वर्ष 2006 से प्रोफेसर पद का लाभ देने की भी मांग की गई है।
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