
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया, जबलपुर। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित नर्सिंग कॉलेज फर्जीवाड़े में हाई कोर्ट की लगातार निगरानी न्यायिक सक्रियता का उल्लेखनीय उदाहरण बन गई है। सितंबर 2021 में एक शिकायत से शुरू हुआ मामला जनवरी 2022 में हाई कोर्ट पहुंचा और इसके बाद मान्यता व्यवस्था से जुड़े पूरे तंत्र की परतें खुलती चली गईं। कोर्ट ने रिकॉर्ड तलब किए, सीबीआई जांच कराई, अधिकारियों और नियामक संस्था की भूमिका पर सवाल उठाए तथा हजारों छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए लगातार समयबद्ध निर्देश दिए।
सितंबर 2021 - शिकायत से शुरुआत : लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल बघेल ने सरकार से शिकायत कर आरोप लगाया कि आदिवासी क्षेत्रों के 55 नर्सिंग कॉलेजों को भवन, लैब और अस्पताल जैसी अनिवार्य सुविधाओं के बिना मान्यता दी गई है।
जनवरी 2022 - हाई कोर्ट पहुंचा मामला : शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने के बाद हाई कोर्ट में याचिका दायर हुई। कोर्ट ने मान्यता से जुड़े रिकॉर्ड तलब कर जांच शुरू की।
रिकॉर्ड की पड़ताल में बड़ा खुलासा : करीब 37,759 पृष्ठ रिकॉर्ड में संलग्न नहीं मिले। लगभग 90 प्रतिशत फाइलों में भवन का स्वीकृत लेआउट गायब था। कई कॉलेजों में एक ही फैकल्टी को कई संस्थानों में दर्शाया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। करीब 800 कॉलेजों की जांच में लगभग 600 कॉलेज अपात्र अथवा गंभीर कमियों वाले पाए गए। जांच में सामने आया कि कहीं गैराज, कहीं एटीएम तो कहीं स्कूल भवन में नर्सिंग कॉलेज संचालित हो रहे थे।
रिश्वत कांड भी सामने आया : सीबीआई जांच के दौरान दो इंस्पेक्टर सहित 13 लोगों की गिरफ्तारी हुई। आरोप सामने आया कि कॉलेजों को मान्यता दिलाने के लिए प्रति कॉलेज दो से 10 लाख रुपये तक रिश्वत ली जा रही थी।
नर्सिंग काउंसिल की भूमिका पर भी सवाल : जांच आगे बढ़ी तो नर्सिंग काउंसिल की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आई। रजिस्ट्रारों की नियुक्ति से लेकर कॉलेजों को मान्यता देने की प्रक्रिया तक में नियमों की अनदेखी के आरोप सामने आए। तत्कालीन पदेन अध्यक्ष डॉ. एनएम श्रीवास्तव के कार्यकाल में भोपाल के मात्र 3000 वर्गफीट के मकान में संचालित सविता नर्सिंग कॉलेज को वर्षों तक मान्यता मिलने का मामला भी सामने आया।
49 कॉलेजों को फिर मान्यता, कोर्ट सख्त : जांच की निगरानी के बीच 49 नए कॉलेजों को मान्यता दिए जाने का मामला सामने आया। रजिस्ट्रार सुनीता सिजू को निलंबित किया गया। बाद में निलंबन की कार्रवाई को कमजोर किए जाने की जानकारी सामने आने पर हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई।
दिसंबर 2024 : रजिस्ट्रार की भूमिका पर सवाल : रजिस्ट्रार अनीता चांद की भूमिका पर सवाल उठे। अपात्र कॉलेज को गलत रिपोर्ट के आधार पर मान्यता देने के आरोपों के बीच हाई कोर्ट ने उन्हें और चेयरमैन को हटाने के आदेश दिए।
फाइलें और सीसीटीवी फुटेज भी गायब : जांच से जुड़ी सीसीटीवी फुटेज और हाई लेवल कमेटी की मूल फाइलें काउंसिल कार्यालय से गायब होने का मामला सामने आया। हाई कोर्ट ने इसकी जांच भोपाल पुलिस कमिश्नर और साइबर सेल को सौंप दी।
जुलाई 2025 : कोर्ट ने वेबसाइट से डाउनलोड की कथित फर्जी मार्कशीट : सुनवाई के दौरान जजों ने नर्सिंग काउंसिल की आधिकारिक वेबसाइट से एक कथित फर्जी मार्कशीट डाउनलोड कर उसकी वास्तविकता की पुष्टि की। इससे सुनवाई के दौरान डिजिटल रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और नियामक संस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल सामने आए।
नियम बदले, कोर्ट ने रोक दिया रास्ता : जांच में फंसे कॉलेजों को राहत देने के लिए भवन क्षेत्रफल की शर्त करीब 23 हजार वर्गफीट से घटाकर 8-9 हजार वर्गफीट किए जाने पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि नियमों में बदलाव का लाभ जांच की जद में आए संस्थानों को न मिले।
नर्सिंग फर्जीवाड़े का यह घटनाक्रम केवल अमानक कॉलेजों की कहानी नहीं है। यह मान्यता देने वाली व्यवस्था, निरीक्षण प्रणाली और नियामक संस्था की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि हाई कोर्ट लगातार रिकॉर्ड नहीं मंगाता, जांच की निगरानी नहीं करता और नियमों में हो रही सेंधमारी को समय रहते नहीं रोकता, तो संभव है कि बड़ी संख्या में अमानक संस्थान वर्षों तक संचालित होते रहते।
इस मामले में हाई कोर्ट की भूमिका केवल फैसला सुनाने तक सीमित नहीं रही। रिकॉर्ड से लेकर मान्यता, जांच, अधिकारियों की भूमिका, नियमों में बदलाव और छात्रों के भविष्य तक, हर महत्वपूर्ण कड़ी पर न्यायिक निगरानी बनी रही। यही वजह है कि मध्य प्रदेश का नर्सिंग फर्जीवाड़ा मामला न्यायिक सक्रियता के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में सामने आता है।
यह भी पढ़ें- MP में 15 लाख कर्मचारियों-पेंशनरों का इंतजार... 2019 से अटका है हेल्थ इंश्योरेंस, पुलिस मॉडल लागू करने की मांग