
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के गलियारों में सोमवार, 15, जून से फिर वह पुरानी रौनक लौटेगी, जो एक महीने की न्यायिक नीरवता के बाद पुराने मंदिर में आरती-सी प्रतीत होगी। समर वेकेशन की घड़ी थम चुकी हैं, अब अदालतों की घड़ियां फिर से अपने नियमित न्याय-ताल पर चल पड़ेंगी।
नवागत एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया के नेतृत्व में न्यायिक व्यवस्था पुनः अपनी सामान्य लय में लौट रही है-जहां आदेश भी बोलते हैं और तारीखें भी इतिहास लिखती हैं।
इस बार का समर वेकेशन थोड़ा अलग रहा। परंपरागत सप्ताह में दो दिन वाली वेकेशन बेंच व्यवस्था को इस बार विस्तार देकर सोमवार, बुधवार और शुक्रवार तक फैलाया गया, ताकि अर्जेंट मामलों की धड़कनें अदालत की देहरी पर ही न थम जाएं। नतीजा यह कि तत्काल न्याय की राह कुछ और चौड़ी हुई और फाइलों की भीड़ पर कुछ राहत की हवा चली।
इधर, न्यायिक गलियारों में अगला प्रशासनिक अध्याय भी करवट बदलने को तैयार दिख रहा है। इंदौर खंडपीठ के प्रशासनिक न्यायाधीश जस्टिस विजय कुमार शुक्ला के 27 जून को सेवानिवृत्त होने के साथ ही कई जिम्मेदारियों की कुर्सियां अपनी जगह बदल सकती हैं। चर्चाओं में नाम भी तैर रहे हैं-कहीं जबलपुर से इंदौर की ओर कोई नया सफर तय हो, तो कहीं प्रशासनिक कमान किसी नए हाथ में सौंप दी जाए।
लेकिन असली तस्वीर इससे बड़ी है-हाई कोर्ट में स्वीकृत 53 पदों के मुकाबले 37 न्यायाधीशों की मौजूदगी। यानी 16 कुर्सियां अब भी खाली हैं। और यही खालीपन, अदालत की दीवारों में गूंजता वह मौन है, जो हर लंबित मामले के साथ और गहरा होता जाता है।
बहरहाल, न्यायालय फिर चल पड़ा है, पर उसके साथ यह सवाल भी चल रहा है-फाइलों की रफ्तार तेज होगी या फिर तारीखों का पहिया वैसे ही घूमता रहेगा? उम्मीदों और आशंकाओं के बीच वही पुराना प्रश्न सिर उठाए खड़ा है। क्या अब लंबित मामलों की फाइलें सचमुच गति पकड़ेंगी या फिर तारीखों का पहिया पहले की तरह ही धीमी लय में घूमता रहेगा? वादकारियों की निगाहें न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर टिकी हैं, और न्याय की त्वरितता की उम्मीदें भी उतनी ही जीवित हैं।
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