• Jagran.com
  • Jagran Josh
  • Her Zindagi
  • Onlymyhealth
  • Jagran TV
  • Vishvas News
  • Inextlive
  • मेरी खबरें
मेरी खबरें
  • होम
  • ताजा खबरें
  • मध्यप्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • राशिफल
  • लाइफस्टाइल
  • अन्य
    • बिज़नेस
    • बड़ी खबरें
    • खेल
    • विदेश
    • करियर
    • टॉपिक्स
    • टेक्नोलॉजी
    • शिक्षा
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • राशिफल
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • फटाफट
  • राशिफल
  • वेब स्टोरीज
नईदुनिया ट्रेंडिंग
  • बढ़ता यूपी
  • समृद्ध उत्तराखंड
  • गणेशोत्‍सव 2026
  • हनुमान अंश
  • मध्‍य प्रदेश की खबरें
  • राशि परिवर्तन
  • मानसून
  • वास्‍तु शास्‍त्र
  • स्वच्छ जल
  • होम
  • मध्य प्रदेश
  • जबलपुर

सपने में दिखे गणपति, फिर पहाड़ी पर मिली वही दिव्य आकृति, जबलपुर में रतन नगर की पहाड़ी पर शिलारूप गणेश भगवान का अनूठा दरबार

संस्कारधानी की पहाड़ियों में आस्था की अनेक कथाएं हैं। कहीं प्राकृतिक गुफाएं श्रद्धा का केंद्र हैं तो कहीं शिलाओं में भगवान का स्वरूप दिखाई देता है।

By Surendra DubeyEdited By: manoj dubey
Publish Date: Tue, 15 Sep 2026 12:26:05 PM (IST)Updated Date: Tue, 15 Sep 2026 12:26:05 PM (IST)
सपने में दिखे गणपति, फिर पहाड़ी पर मिली वही दिव्य आकृति, जबलपुर में रतन नगर की पहाड़ी पर शिलारूप गणेश भगवान का अनूठा दरबार
सुप्तेश्वर गणेश भगवान।

HighLights

  1. विराट स्वरूप के स्वप्न में दर्शन होने की बात कही जाती है
  2. 4 सितंबर 1989 को गंगाजल और नर्मदा जल से पहला अभिषेक
  3. गजानन की कल्कि स्वरूप में पूजा किए जाने की मान्यता

सुरेन्द्र दुबे , नईदुनिया जबलपुर। संस्कारधानी की पहाड़ियों में आस्था की अनेक कथाएं हैं। कहीं प्राकृतिक गुफाएं श्रद्धा का केंद्र हैं तो कहीं शिलाओं में भगवान का स्वरूप दिखाई देता है। रतन नगर की पहाड़ी पर स्थित सुप्तेश्वर गणेश की कथा इन सबसे अलग है।

यहां भगवान गणेश की प्रतिमा किसी शिल्पकार ने नहीं गढ़ी, बल्कि प्राकृतिक शिला में उभरी आकृति को भक्त गजानन का स्वयंभू स्वरूप मानकर पूजते हैं।

विराट स्वरूप के स्वप्न में दर्शन होने की बात कही जाती है

इसके पीछे स्वप्न, विशाल शिला और तीन दशक से अधिक समय में विकसित हुई लोकआस्था की कहानी है। मंदिर से जुड़े विवरणों के अनुसार इसकी शुरुआत वर्ष 1985 में हुई। सुधा अविनाश राजे को भगवान गणेश के विराट स्वरूप के स्वप्न में दर्शन होने की बात कही जाती है।


इसके बाद रतन नगर की पहाड़ी पर प्राकृतिक शिला में गणेश जैसी आकृति दिखाई दी। श्रद्धालुओं ने इसे स्वप्न से जोड़कर देखा और शिला को भगवान का स्वरूप मानते हुए पूजा-अर्चना शुरू की।

4 सितंबर 1989 में हुआ पहला अभिषेक

इस आस्था यात्रा में 4 सितंबर 1989 का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसी दिन प्राकृतिक शिला का गंगाजल और नर्मदा जल से अभिषेक किया गया। इसके बाद सिंदूर और घी अर्पित कर पूजा की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे आसपास के लोग यहां पहुंचने लगे और पहाड़ी का यह स्थान नियमित पूजा-अर्चना का केंद्र बन गया।

गणेश की सबसे बड़ी विशेषता प्राकृतिक शिला

जबलपुर में नर्मदा आस्था की धुरी है, इसलिए सुप्तेश्वर की स्थापना कथा में नर्मदा जल का जुड़ना इसे संस्कारधानी की धार्मिक चेतना से जोड़ता है। सुप्तेश्वर गणेश की सबसे बड़ी विशेषता प्राकृतिक शिला है। यहां चट्टान में उभरी आकृति को ही गजानन का स्वरूप मानकर पूजा जाता है।

गजानन की कल्कि स्वरूप में पूजा किए जाने की मान्यता

सिंदूर से सजी विशाल शिला में गणेश आकृति के साथ घोड़े का स्वरूप भी दिखाई देता है। इसी धार्मिक व्याख्या के आधार पर यहां गजानन की कल्कि स्वरूप में पूजा किए जाने की मान्यता है। गणेश और कल्कि स्वरूप का यह संगम मंदिर को जबलपुर के अन्य गणेश मंदिरों से अलग पहचान देता है।

भगवान के दरबार में अर्जी लगाते हैं

यहां आने वाले श्रद्धालु मनोकामना लेकर भगवान के दरबार में अर्जी लगाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर सिंदूर चढ़ाने की परंपरा बताई जाती है। इसी कारण स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच सुप्तेश्वर को ‘अर्जी वाले गणेश’ के रूप में भी श्रद्धा मिलती है। गणेशोत्सव के दौरान पहाड़ी पर विशेष चहल-पहल रहती है।

यहां प्रतिमा पहले नहीं बनी, पहले विश्वास जन्मा

पूजा, अभिषेक और आरती के बीच वातावरण भक्तिमय हो जाता है। पर्व के अलावा भी श्रद्धालुओं का आना-जाना बना रहता है। सुप्तेश्वर की कथा केवल मंदिर स्थापना की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति और आस्था के मेल की कहानी है। यहां प्रतिमा पहले नहीं बनी, पहले विश्वास जन्मा।

सिंदूर से सजी इस विशाल शिला, विघ्नहर्ता का दरबार

शिला पहले से थी, उसमें गजानन का स्वरूप भक्तों की आस्था ने देखा और वही प्राकृतिक आकृति धीरे-धीरे तीर्थ में बदलती गई। आज रतन नगर की पहाड़ी पर सिंदूर से सजी इस विशाल शिला के सामने श्रद्धालुओं के लिए वह केवल पत्थर नहीं, बल्कि विघ्नहर्ता का दरबार है।