
नईदुनिया प्रतिनिधि, राजगढ़। अंग्रेजों के खिलाफ नरसिंहगढ़ से भी चिंगारी उठी थी। यहां के कुंवर चैनसिंह के सामने अंग्रेजी हुकुमत ने तीन शर्तें रखीं, लेकिन राजवंशीय परंपरा को मानने वाले चैनसिंह ने शर्तों को मानने से इंकार कर दिया।
जिसके चलते अंग्रेजों ने युद्ध का बिगुल छेड़ दिया और नरसिंहगढ़ के कुंवर चैनसिंह अपने वफादार सैनिक हिम्मत खां एवं बहादुर खां के साथ अंग्रेजों से लड़ते हुए 24 जुलाई 1824 को सीहोर छावनी में बलि की वेदी पर बलिदान हो गए।
24 जुलाई को उनकी याद में नरसिंहगढ़ व सीहोर में आयोजन होंगे। 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी और भोपाल के तत्कालीन नवाब के बीच हुए समझौते के बाद कंपनी ने सीहोर में एक हजार सैनिकों की छावनी बनाई। कंपनी द्वारा नियुक्त पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को इस फौजी टुकड़ी की कमान सौंपी गई। समझौते के तहत मैडॉक को भोपाल सहित नरसिंहगढ़, खिलचीपुर और राजगढ़ रियासत से संबंधित राजनीतिक अधिकार दिए गए।
इस फैसले को नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज अमर शहीद कुंवर चैन सिंह ने गुलामी की निशानी मानते हुए स्वीकार नहीं किया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर दिया। कुंवर चैनसिंह ने धन का प्रबंधन करने के लिए दीवान आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा को कहा, लेकिन वह दोनों अंग्रेजों के वफादार दीवान थे।
ऐसे में कुंवर चैनसिंह ने आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा की हत्या कर दी और अंग्रेजों से लोहा लेने अपने साथियों के साथ सीहोर जा पहुंचे। सीहोर में होने वाले आयोजन में मंत्री नारायणसिंह पंवार मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।
कुंवर के सामने अंग्रेजों ने आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा की हत्या के केस को लेकर तीन शर्तें रखी।पहली, वह नरसिंहगढ़ छोड़कर काशी निवास करो। दूसरी, 2-3 वर्ष तक नरसिंहगढ़ राज्य अंग्रेजों के अधीन करें और तीसरी शर्त यह थी कि नरसिंहगढ़ क्षेत्र में होने वाली अफीम की खरीद सिर्फ अंग्रेज ही करेंगे।
इसके साथ जनरल मैडॉक ने यह भी कहा कि यदि शर्त नहीं मानी गई तो कुंवर के खिलाफ दोनों हत्याओं का मुकदमा चलेगा। कुंवर चैनसिंह ने उक्त सभी शर्तों को मानने से मना कर दिया।
छावनी से घोड़े पर बैठकर कैम्प से बाहर जाने लगे तब अंग्रेजों के कर्मचारियों ने उन्हें यह कहते हुए रोक दिया कि आपको कैम्प से बाहर जाने की इजाजत नहीं है। वे मैडॉक और जॉनसन के आदेश की अवहेलना कर कैम्प से बाहर चले गये। मना करने के बाद भी कुंवर चैन सिंह के बाहर चले जाने से युद्ध की आशंका के चलते मैडॉक ने सेना को बुलवाने का प्रबंध किया और यह सेना डबरी की छावनी, सीहोर की छावनी, भोपाल तथा होशंगाबाद से बुलवाई थी।
लगभग 5 से 6 हजार सैनिक सीहोर पहुंच चुके थे। मैडॉक ने कुंवर की तलवार की प्रसंशसा कर उसे देखने के लिए मांगा। एवं दूसरी तलवार भी मागी तो कुंवर ने उनके कटिल इरादों को भापकर दूसरी तलवार यह कहकर नही दी कि राजपूत की कमर कभी खाली नहीं रहती।
रात्रि में कुंवर चैन सिंह के कैम्प को घेर लिया और अंग्रेजी फौज द्वारा आक्रमण कर दिया गया। कुंवर चैन सिंह अपने विश्वस्त साथी हिम्मत खां और बहादुर खां सहित 43 सैनिकों के साथ अंग्रेजी फौज का वीरतापूर्वक सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
नरसिंहगढ़ छारबाग स्थित कुंवर चैनसिंह जी की छतरी पर आंधाशीशी, एकातरा जैसी अन्य बीमारियों हेतु लोग पत्थर रखकर मान्यता करते हैं। प्रति शनिवार को नगरवासियों द्वारा पूजा अर्चना की जाती है। बुंदेलखंड एवं मालवा क्षेत्र की महिलाएं लोकगीत के रूप में इनकी वीरता के गीत आज भी गाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कांकड़ पर कुंवर चैनसिंह जी के पूजा स्थल के चबूतरे मौजूद हैं।
रघुनाथपुरा, लष्करपुर, सराना, विजयगढ़ में आज भी इनकी देवरूप बैठके होती है। स्मरणीय है कि विगत 25-30 वर्षों से नरसिंहगढ़ मे हिंदू- मुस्लिम सभी जाति वर्ग के लोगों द्वारा गठित समिति कुंवर चैनसिंह की स्मृति समारोह मनाकर उनके बलिदान दिवस को यादगार करती है।