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विकास में आड़े आया मप्र का एकमात्र बचा पीले पलाश का वृक्ष, बचाने में जुटे विज्ञानी

चित्रकूट के रास्ते अयोध्या तक की यात्रा आसान हो जाएगी, लेकिन यहां मझगवां के चितहरा मोड़ के पास स्थित दुर्लभ पीले पलाश का वृक्ष फोरलेन निर्माण कार्य मे...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Fri, 07 Aug 2026 09:06:25 AM (IST)Updated Date: Fri, 07 Aug 2026 09:06:25 AM (IST)
विकास में आड़े आया मप्र का एकमात्र बचा पीले पलाश का वृक्ष, बचाने में जुटे विज्ञानी
मझगवां के चितहरा मोड़ के पास लगा पीले पलाश का पेड़। नईदुनिया

HighLights

  1. उप्र के चित्रकूट से मप्र के सतना तक फोरलेन निर्माण की वजह से हटाया जाना है यह वृक्ष
  2. बीजों से पौधे तैयार किए तो फूल ही नहीं आए, ट्रांसलोकेट करने पर खत्म होने की आशंका
  3. एसएफआरआइ ने अब देश-विदेश के विशेषज्ञों से सहायता लेने के लिए सीएम को लिखा

शिवम कृष्ण त्रिपाठी, नईदुनिया सतना। मध्य प्रदेश के इकलौते माने जा रहे पीले पलाश के पेड़ पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वजह यह है कि राष्ट्रीय राजमार्ग 135 बीजी में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से मध्य प्रदेश के मझगवां होते हुए सतना शहर तक 77 किलोमीटर लंबे फोरलेन का निर्माण होना है। उसे ट्रांसलोकेट तो किया जा सकता है, किंतु ऐसा करने पर वृक्ष के खत्म होने की वनस्पति विज्ञानियों की आशंका ने बड़ी समस्या खड़ी कर दी है।

यह समस्या इसलिए और भी बढ़ गई है

क्योंकि पिछले दिनों कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां व आरोग्यधाम चित्रकूट में पीले पलाश को संरक्षित करने के लिए बीजों से नए पौधे तैयार किए गए, लेकिन उनमें फूल नहीं आए। इसके बाद से वनस्पति विज्ञानी चिंता में हैं। ऐसे में, अब इस प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए अब राज्य के दीनदयाल शोध संस्थान प्रबंधन ने मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है।


मुख्यमंत्री को देश-विदेश के विज्ञानियों से सहायता लेनी चाहिए

विज्ञानियों का सुझाव है कि वृक्ष को बचाने के लिए मुख्यमंत्री को देश-विदेश के विज्ञानियों से सहायता लेनी चाहिए। ट्रांसलोकेट में वृक्ष बचने की 40 से 50 प्रतिशत संभावना- वनमंडल अधिकारी मंयक चांदीवाल ने बताया कि वृक्ष को ट्रांसलोकेट करने की तैयारी तो की है, लेकिन इसमें खतरा यह है कि इस विधि में वृक्ष के बचने की उम्मीद 40-50 प्रतिशत ही रहती है।

चार सदस्यीय टीम ने शोध करके कुछ सुझाव दिए

ऐसे में, वन विभाग के अनुरोध पर जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआइ) के विज्ञानियों की चार सदस्यीय टीम ने शोध करके कुछ सुझाव दिए हैं। उसके आधार पर वृक्ष पर एयर लेयरिंग कराई गई है। इससे जड़ से उसी जींस के नए पौधे बनाए जाएंगे।

एसएफआरआइ ने संरक्षण के लिए तीन विधियां

एयर लेयरिंग, रेट सकर व टीशू कल्चर की प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी है। वहीं, दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव अभय महाजन ने सड़क मार्ग थोड़ा परिवर्तित कर इस पेड़ को सुरक्षित रखने का सुझाव दिया है।

यह है उपयोगिता

पीला पलाश जैव विविधता, औषधीय गुणों और पर्यावरण संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका फूल सामान्यतः लाल-नारंगी होता है। आयुर्वेद में पीले पलाश के फूल, बीज, छाल और गोंद का उपयोग कृमिनाशक, त्वचा रोगों, घाव भरने और पाचन संबंधी समस्याओं में किया जाता है। यह मधुमक्खियों, तितलियों और कई पक्षियों के लिए रस का महत्वपूर्ण स्रोत है।

पीला पलाश दुर्लभ है और मेरी जानकारी में मध्य प्रदेश में अब यह एकमात्र पेड़ ही है, इसलिए हम इसके संरक्षण के लिए प्रयास कर रहे हैं। टीशू कल्चर के जरिए बहुत से पौधे तैयार भी हुए हैं लेकिन उनमें फूल नहीं आ रहे हैं। अब पेड़ को सुरक्षित रखने के लिए कोई और रास्ता अपनाया जाएगा।

- डाॅ. अखिलेश कुमार जांगरे, विज्ञानी, कृषि विकास केंद्र मझगवां।

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