
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन : श्रावण-भाद्रपद मास में सोमवार को पेशवाई की तरह निकली भगवान महाकाल की राजसी सवारी में सिंहस्थ की झलक दिखाई नहीं दी। मंदिर समिति मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मंशा को मूर्त रूप नहीं दे पाई।
दो किलोमीटर लंबे कारवां में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि यह सवारी सिंहस्थ की थीम पर आधारित है। दो विभाग मिलकर सिंहस्थ की एक झांकी भी ठीक से तैयार नहीं कर पाए। चौरासी महादेव की पुरानी झांकी के फोटो बदलकर दायित्वों की इतिश्री कर ली गई। सिंहस्थ के नाम पर मंदिर समिति के फ्लाप शो ने देशभर से आए श्रद्धालुओं को भी निराश किया।
इस बार श्रावण-भाद्रपद मास में निकलने वाली भगवान महाकाल की छह सवारियों के लिए मंदिर समिति ने अलग-अलग थीम निर्धारित की थी। शुरुआती पांच सवारी में इसकी झलक दिखाई दी लेकिन राजसी सवारी में मंदिर समिति सिंहस्थ की उस गौरवशाली परंपरा को बरकार नहीं रख पाई, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
मुख्यमंत्री इस सवारी को देश दुनिया के सामने सिंहस्थ के पूर्वाभास के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे, लेकिन सवारी सिंहस्थ की नहीं बल्कि पारंपरिक थीम पर आधारित लगी। मंदिर समिति सिंहस्थ की झलक के रूप में इसका प्रचार-प्रसार भी नहीं कर पाई। भक्तों को केवल नए मार्ग से सवारी देखते समय ही लगा कि सिंहस्थ में ऐसे चौड़े, सुव्यवस्थित और नवश्रृंगारित मार्ग से पेशवाई देखने का वास्तविक अनुभव कैसा रहेगा।
विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर से सोमवार को श्रावण-भाद्रपद मास की राजसी सवारी निकली। शाही ठाठ बाट से निकली सवारी में भगवान महाकाल ने भक्तों को एक साथ छह रूपों दर्शन दिए। अवंतिकानाथ चांदी की पालकी में चंद्रमौलेश्वर, हाथी पर मनमहेश, गरुड़ पर शिवतांडव, नंदी पर उमा महेश, रथ पर होलकर तथा सप्तधान रूप में सवार होकर दर्शन देने निकले। सात किलो मीटर लंबे सवारी मार्ग पर पांच घंटे भक्ति का उल्लास छाया रहा। राजसी सवारी में पहली बार ईशा फाउंडेशन के कैलाश वाद्यम बैंड ने मनहर प्रस्तुति दी। छह से अधिक स्थानीय बैंडों ने भी सवारी में सुरमयी प्रस्तुति दी।