
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन: लैंड पूलिंग एक्ट के खिलाफ किसानों के आक्रामक और संगठित आंदोलन के आगे आखिरकार राज्य सरकार को झुकना पड़ा। उज्जैन से शुरू हुए विरोध ने राज्यस्तरीय आंदोलन का रूप ले लिया और आखिरकार सरकार ने लैंड पूलिंग एक्ट को पूरी तरह निरस्त करने का निर्णय घोषित कर दिया।
यह वही एक्ट है, जिसमें पहले आंशिक संशोधन कर किसानों को संतुष्ट करने की कोशिश की गई थी, लेकिन किसान संगठनों ने इसे सिरे से नकार दिया था। लैंड पूलिंग एक्ट निरस्त कराने की आंदोलनात्मक शुरुआत करीब तीन महीने पहले शहर में निकाली गई ट्रैक्टर रैली से हुई थी। इसके बाद 5 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर महिला किसानों ने रामघाट पर दीपदान कर हाथों में तख्तियां लेकर विरोध प्रदर्शन किया। सरकार को “सद्बुद्धि” देने के उद्देश्य से यज्ञ भी किया गया।
दबाव के चलते 17 नवंबर को सरकार ने एक्ट निरस्त करने की घोषणा तो की, लेकिन जब गजट नोटिफिकेशन सामने आया तो उसमें एक्ट को पूरी तरह खत्म करने के बजाय केवल संशोधन दर्ज थे। इससे किसानों में आक्रोश फैल गया और विभिन्न स्तरों पर ज्ञापन सौंपे गए।
भारतीय किसान संघ ने चेतावनी दी थी कि यदि आदेश वापस नहीं लिया गया तो प्रदेश के 18 जिलों की 115 तहसीलों से हजारों किसान उज्जैन पहुंचकर डेरा डालेंगे और प्रशासनिक कार्यालयों का घेराव करेंगे। इस अल्टीमेटम का सीधा असर हुआ और सरकार ने अंततः लैंड पूलिंग एक्ट को पूरी तरह निरस्त करने का फैसला लिया।
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किसान संगठनों ने इसे एकजुट संघर्ष की ऐतिहासिक जीत बताया है। उनका कहना है कि यह फैसला केवल उज्जैन ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के किसानों के हित में है और यह संदेश देता है कि संगठित आंदोलन से किसान अपने अधिकार और जमीन दोनों की रक्षा कर सकते हैं।