
नईदुनिया प्रतिनिधि, उमरिया। हर दिन की तरह उस दिन भी वे अपने दो सहयोगियों के साथ बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के परिक्षेत्र पतौर की गंजरहा बीट में हलफल नदी के किनारे बर्ड वाचिंग के लिए पैदल गश्त पर निकले थे।
नदी की मुलायम रेत और ठंडा पानी पैरों को राहत दे रहे थे। वे सभी पक्षियों का अवलोकन करते हुए नदी के किनारे-किनारे काफी दूर निकल आए।
देखते-देखते शाम होने लगी और धूप की तपिश भी कम हो गई। वापसी के समय जब वे नदी के उथले पानी से होकर चल रहे थे तब उनका सामना अचानक एक बाघिन से हो गया।
वे सभी जूते हाथ में लिए आपस में बातचीत करते हुए आराम से आगे बढ़ रहे थे। जंगल पूरी तरह शांत था। कहीं से भी यह आभास नहीं हो रहा था कि आसपास कोई बाघ मौजूद हो सकता है।
अचानक उनकी नजर रेत पर बने ताजे बाघ के पगमार्क पर पड़ी। वे उन्हें ध्यान से देखने के लिए एक कदम आगे बढ़े ही थे कि सामने घास के पैच से एक मादा बाघिन दिखाई दी। उनकी नजरें मिलीं और अगले ही पल उसने जोरदार दहाड़ लगाई।
इसी के साथ बाघिन दूसरी ओर भागी और वे सभी लोग भी सहज प्रतिक्रिया में जितनी तेजी से हो सकता था, उससे दूर भागे। उस क्षण जब बाघिन को उन्होंने देखा था वह उनसे महज चार-पांच फुट की दूरी पर थी। न कुछ सोचने का समय था, न समझने का कि क्या करना चाहिए। सब कुछ केवल दस सेकंड के भीतर घटित हो गया।
वे तुरंत नदी से बाहर निकलकर पास की पहाड़ी की ओर चले गए। कुछ देर रुककर आसपास देखा, लेकिन न बाघिन दिखाई दी और न उसके शावक। हालांकि उनके पगमार्क साफ बता रहे थे कि वे वहीं आसपास मौजूद थे।
उस घटना के बाद वे तीनों कुछ देर तक स्तब्ध रहे। मन में बार-बार बाघिन का वही दृश्य और उसके शावकों के पदचिह्न घूमते रहे। उनके पास न बचाव की तैयारी का समय था और न ही कभी कल्पना की थी कि बाघिन और उसके बच्चों से इतना नजदीकी सामना होगा।
उस घटना को पाँच वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन वह पल आज भी स्मृतियों में उतना ही जीवंत है। जब भी वे और उनके साथी उस दिन को याद करते हैं, चेहरे पर अनायास मुस्कान आ जाती है और मन में यह एहसास भी कि जंगल में हर कदम सतर्कता और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है।
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