नवदुनिया प्रतिनिधि, विदिशा/ ग्यारसपुर। बरसात ने ग्यारसपुर की धरती में दबी एक और ऐतिहासिक धरोहर को बाहर ला दिया। ग्यारसपुर से करीब दो किलोमीटर दूर सागर मार्ग पर निर्माणाधीन नेशनल हाईवे-146 की पटरी पर मिट्टी के ढेर से खंडित अवस्था में सनातन परंपरा से जुड़ी देवी-देवता की युगल पत्थर प्रतिमा दिखाई दी।
डंपरों से लाई गई मिट्टी यहां डाली जा रही थी
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हाईवे निर्माण के लिए डंपरों से लाई गई मिट्टी यहां डाली जा रही थी। दो दिन पहले हुई तेज बारिश में मिट्टी का ढेर बह गया, जिससे उसमें दबी यह प्रतिमा दिखाई देने लगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि ग्यारसपुर जैसे पुरातात्विक महत्व वाले क्षेत्र में निर्माण कार्य के दौरान यदि कोई प्राचीन अवशेष मिलता है तो उसे तत्काल सुरक्षित कराया जाना चाहिए था, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।
ऐतिहासिक महत्व का आकलन किया जाएगा
जिला पुरातत्व अधिकारी नम्रता यादव ने बताया कि उन्हें इस मामले की जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली। इसके बाद संबंधित कर्मचारियों को मौके पर भेजकर प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर रखने के निर्देश दिए गए हैं। प्रतिमा का परीक्षण कर उसके ऐतिहासिक महत्व का आकलन किया जाएगा।
ग्यारसपुर की मिट्टी में बिखरी है सदियों पुरानी विरासत
सेवानिवृत्त शिक्षक एवं स्थानीय इतिहास के जानकार रामसेवक सक्सेना बताते हैं कि ग्यारसपुर प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी रही है। आज भी नगर के कई हिस्सों में प्राचीन प्रतिमाओं और शिल्प अवशेषों के चिन्ह मौजूद हैं। विश्राम गृह परिसर, कंकाली मंदिर, मानसरोवर तालाब, बमूरा मोहल्ला, थूआरभिटा की पहाड़ी, कटारमल की पहाड़ी, मालादेवी की पहाड़ी और संत तारण स्कूल के आसपास समय-समय पर प्राचीन प्रतिमाएं एवं अवशेष मिलते रहे हैं।
यह भी पढ़ें- यूपी के आगरा से एमपी के अशोकनगर तक नकली नोटों का जाल, 87,700 की जाली मुद्रा के साथ तीन गिरफ्तार, 100 की गड्डियों में एक जैसी सीरीज
इनमें से अनेक दुर्लभ मूर्तियों को पहले ही संग्रहालय में सुरक्षित रखा जा चुका है। ऐसे में हर नया अवशेष ग्यारसपुर के इतिहास की एक नई कड़ी जोड़ता है।
सड़क बने, लेकिन इतिहास न दब जाए
ग्यारसपुर की पहचान केवल एक कस्बे की नहीं, बल्कि हजार साल से अधिक पुरानी सांस्कृतिक विरासत की है। ऐसे क्षेत्र में सड़क, पुल या अन्य बड़े निर्माण कार्य विकास की जरूरत हैं, लेकिन इनके साथ विरासत संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।
पुरातत्व प्रेमियों का सवाल है कि यदि बारिश नहीं होती तो क्या यह प्रतिमा हमेशा के लिए मिट्टी में दब जाती? क्या निर्माण एजेंसियों के पास ऐसी कोई व्यवस्था है कि खुदाई के दौरान मिलने वाले पुरावशेषों की तुरंत सूचना पुरातत्व विभाग को दी जाए।