
दिल्ली के मालवीय नगर में बुधवार सुबह एक रेस्टोरेंट-गेस्ट हाउस में भीषण आग लगने से 21 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। अपनों का इलाज कराने आए बेकसूर लोग खुद मौत के मुंह में समा गए, जिसने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

(इमेज सोर्स - पीटीआई)
मौत का तांडव... सुबह की शुरुआत अमूमन उम्मीदों के साथ होती है, लेकिन बुधवार की इस सुबह ने मालवीय नगर के एक होटल को पल भर में श्मशान बना दिया। आसमान छूती आग की ये खौफनाक लपटें गवाही दे रही हैं कि वहां अंदर मौजूद मासूमों पर क्या गुजरी होगी।

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अपनों को ढूंढती आंखें... आग लगते ही चारों तरफ कोहराम मच गया। धुएं के गुबार के बीच लोग अपनी जान बचाने के लिए बदहवास भाग रहे थे। कोई अपने बच्चे को पुकार रहा था, तो कोई अपने बुजुर्ग माता-पिता को। चंद मिनटों में सब कुछ राख होने की कगार पर था।

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जमीन के नीचे दबी जिंदगी... हादसे के वक्त रेस्टोरेंट में सुबह का नाश्ता परोसा जा रहा था। बेसमेंट में बने तंग कमरों में कई लोग मौजूद थे, जिन्हें अंदाजा भी नहीं था कि ऊपर मौत जाल बुन चुकी है। जब तक वे संभलते, जहरीले धुएं ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया।
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इलाज कराने आए थे, जान गंवा बैठे... रेस्टोरेंट के ठीक ऊपर बने गेस्ट हाउस में कई विदेशी नागरिक और पास के मैक्स अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजन ठहरे हुए थे। खिड़कियों से मदद की गुहार लगाते इन बेबस चेहरों को नहीं पता था कि अपनों की तीमारदारी का यह सफर उनके जीवन का आखिरी सफर बन जाएगा।

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आग की लपटों से जिंदगी छीनते जांबाज... सूचना मिलते ही दमकल विभाग और पुलिस की टीमें मौके पर पहुंचीं। जब हर कोई अपनी जान बचाकर भाग रहा था, तब ये जांबाज खुद को आग के हवाले कर लोगों को बाहर निकालने के लिए इमारत में दाखिल हो रहे थे।

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मौत के मुंह से सुरक्षित वापसी... दमकलकर्मियों ने अपनी जान पर खेलकर 40 से ज्यादा लोगों को इस सुलगती इमारत से सुरक्षित बाहर निकाला। क्रेन और सीढ़ियों के सहारे जब लोगों को नीचे उतारा गया, तो उनकी आंखों में सिर्फ और सिर्फ खौफ तैर रहा था।

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फर्ज की राह में झुलसी खाकी... इस भीषण आग से लोगों को बचाते-बचाते 10 पुलिसकर्मी भी गंभीर रूप से झुलस गए। दूसरों के घरों के चिराग को बुझने से बचाने के लिए इन जवानों ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की और डटे रहे।

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चंद रुपयों के लालच ने ली 21 जानें... नियमों की धज्जियां उड़ाकर इस गेस्ट हाउस में सिर्फ 6 कमरों की जगह 25 कमरे बना दिए गए थे। कंक्रीट के इस अवैध पिंजरे में भागने का कोई रास्ता नहीं था। मकान मालिक और कंस्ट्रक्शन ठेकेदार की यह लापरवाही आज 21 परिवारों की बर्बादी की वजह बन गई।

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पीछे छूट गईं सिर्फ यादें... अग्निकांड शांत होने के बाद जो मंजर दिखा, वह दिल दहला देने वाला था। जले हुए सूटकेस, बिखरे हुए कपड़े और राख हो चुके खिलौने चीख-चीखकर उन लोगों की कहानी बयां कर रहे थे, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। सब कुछ खत्म हो चुका था।

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अब कभी नहीं लौटेंगे वो... अपनों को खो देने का गम क्या होता है, यह इन बिलखते परिजनों की आंखों से बहते आंसुओं को देखकर समझा जा सकता है। दिल्ली में अपनों का इलाज कराने का सपना लेकर आए इन बेकसूरों को क्या मालूम था कि वे खुद लाश बनकर घर लौटेंगे।