
डिजिटल डेस्क, नईदुनिया। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार को एक बड़े बदलाव का गवाह पूरा देश बना। भाजपा ने 15 वर्षों से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को हटाते हुए राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। इससे पहले राज्य में 34 वर्षों तक वामपंथी और दो दशकों तक कांग्रेस का शासन रहा था। इस जीत को उस विचारधारा की वापसी माना जा रहा है, जिसकी नींव डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने रखी थी।

पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीति ‘बाहरी बनाम भीतरी’ और ‘बंगाली अस्मिता’ के इर्द-गिर्द केंद्रित रही। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस चुनाव में भी क्षेत्रीय गौरव और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों को उठाया, लेकिन जनता ने इसे नकार दिया। SIR (मतदाता सूची शुद्धिकरण) को भी तृणमूल ने मुद्दा बनाने की कोशिश की, परंतु परिणामों ने साफ किया कि यह जनता के लिए प्राथमिक मुद्दा नहीं था। मुस्लिम बहुल जिलों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना में भाजपा की बढ़त ने पारदर्शिता की मांग को उजागर किया।
भाजपा ने राज्य के कई मजबूत गढ़ों में सेंध लगाई है। कोलकाता, दक्षिण 24 परगना, हावड़ा और पूर्व बर्द्धमान जैसे जिलों में, जहां पहले भाजपा कमजोर थी, इस बार उसने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। पार्टी के संगठनात्मक प्रयास और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की मेहनत का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। सरकारी कर्मचारियों और मध्य वर्ग ने भी बदलाव के पक्ष में मतदान किया।

इस चुनाव में लगभग 93 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जिसमें महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। मतदान केंद्रों पर महिलाओं की लंबी कतारों ने संकेत दिया कि सुरक्षा और सम्मान के मुद्दे ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं ने महिला मतदाताओं के रुख को प्रभावित किया।
चुनाव परिणामों से यह भी संकेत मिला कि मुस्लिम वोटों में बिखराव हुआ है। मालदा, उत्तर दिनाजपुर और बीरभूम जैसे क्षेत्रों में भाजपा का बेहतर प्रदर्शन यह दर्शाता है कि पारंपरिक वोट बैंक में बदलाव आया है। इससे भाजपा को अप्रत्याशित लाभ मिला।
जनता ने घुसपैठ, भ्रष्टाचार और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसे मुद्दों पर स्पष्ट संदेश दिया है। भाजपा ने रोजगार, आर्थिक सुरक्षा और बेहतर प्रशासन का वादा किया, जो मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रहा। उत्तर बंगाल और जंगलमहल के कई जिलों में तृणमूल का प्रदर्शन शून्य रहा, जो बड़े बदलाव का संकेत है।
तृणमूल कांग्रेस ने ‘बंगाली अस्मिता’ और ‘बाहरी बनाम भीतरी’ का नैरेटिव खड़ा किया, लेकिन जनता के लिए असली मुद्दे रोजगार, भ्रष्टाचार और सुरक्षा थे। भावनात्मक अपील जमीनी समस्याओं के सामने टिक नहीं पाई।
‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं के बावजूद महिलाओं ने सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दी। संदेशखाली और आरजी कर जैसे मामलों ने गुस्सा पैदा किया, जो वोटिंग में साफ दिखा।
मतदाता सूची से नाम हटाने (SIR) को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया गया, लेकिन नतीजों से साफ हुआ कि जनता ने इसे प्राथमिकता नहीं दी। जिन जिलों में ज्यादा नाम कटे वहीं भाजपा को बढ़त मिली।
पहली बार मुस्लिम वोटों का एकतरफा झुकाव नहीं दिखा। मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर जैसे इलाकों में वोट बिखरे, जिससे भाजपा को सीधा फायदा मिला।
भाजपा ने चार साल में जमीनी स्तर पर मजबूत नेटवर्क खड़ा किया। कार्यकर्ताओं ने लगातार काम किया जबकि तृणमूल सत्ता में रहते हुए एंटी-इंकम्बेंसी से जूझती रही।
सातवें वेतन आयोग और आर्थिक मुद्दों को लेकर नाराजगी थी। इस वर्ग ने बदलाव के पक्ष में वोट किया जो कई शहरी सीटों पर निर्णायक साबित हुआ।
भाजपा ने जटिल नैरेटिव के बजाय सीधा संदेश दिया विकास, रोजगार और सुरक्षा। यही मैसेज हर वर्ग तक पहुंचा और असरदार रहा।