जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत मीनाक्षी नटराजन के पास चुनाव याचिका दाखिल करने की छूट, सुप्रीम कोर्ट ने केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की
मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन की नामांकन खारिज करने के रिटर्निंग अफसर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 12 Jun 2026 06:00:32 PM (IST)Updated Date: Fri, 12 Jun 2026 06:10:14 PM (IST)
HighLights
- नटराजन की रिटर्निंग अफसर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
- अभी सिर्फ कोर्ट ने एक निजी शिकायत पर उन्हें सम्मन जारी किया हैः सिंघवी
- चुनाव लड़ना विधायी अधिकार है यह कोई मौलिक अधिकार नहीं हैः रोहतगी
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन की नामांकन खारिज करने के रिटर्निंग अफसर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। शीर्ष कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव याचिका दाखिल करने की छूट है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और एएस चंदुरकर की पीठ ने नटराजन के वकील अभिषेक मनु सिंघवी, प्रतिपक्षी वकील मुकुल रोहतगी, कनु अग्रवाल, चुनाव आयोग की ओर से डीएस नायडू व मध्य प्रदेश सरकार की ओर से तुषार मेहता की दलीलें सुनने की बाद सुनवाई से इन्कार कर दिया।
नटराजन की तरफ से क्या दलील दी अभिषेक मनु सिंघवी ने
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अभिषेक मनु सिंघवी ने रिटर्निंग ऑफिसर के नामांकन खारिज करने के आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 33ए कहती है कि दो साल से अधिक सजा वाले अपराध या जिन आपराधिक मामलों में अदालत ने आरोप तय कर दिये हों उनका ब्योरा हलफनामे में देना होगा।
लेकिन जिस केस का खुलासा न करने के लिए रिटर्निंग ऑफिसर ने नामांकन रद किया है, उसमें अदालत से आरोप तय नहीं हुए हैं। न ही अदालत ने संज्ञान लिया है। अभी सिर्फ कोर्ट ने एक निजी शिकायत पर उन्हें सम्मन जारी किया है।
मुकुल रोहतगी ने सिंघवी की दलीलों का किस आधार पर किया विरोध
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जबकि प्रतिवादी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने सिंघवी की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि चुनाव लड़ना विधायी अधिकार है यह कोई मौलिक अधिकार नहीं है। ऐसे में इस संबंध में अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई नहीं कर सकता क्योंकि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर दाखिल की जाती है।
रोहतगी का कहना था कि ऐसी किसी भी याचिका पर सुनवाई करने पर अनुच्छेद 329 स्पष्ट रूप से रोक लगाता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियम के मुताबिक हलफनामे में सभी लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा देना होता है सिर्फ उन मामलों का नहीं जिनमें आरोप तय हुए हों।
दोनों वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
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कोर्ट ने कहा कि अगर सिंघवी की दलीलें स्वीकार की जाती हैं तो इसका मतलब है कि जिन मामलों में नामांकन खारिज होने में स्पष्ट गलती है तो कोर्ट उन्हें अनुच्छेद 32 और 226 के तहत दाखिल याचिकाओं में सुन सकता है और जहां नामांकन खारिज होना पहली निगाह में स्पष्ट तौर पर उतना गलत नहीं है।
उन्हें चुनाव याचिकाओं के लिए भेज दिया जाए, ऐसा करने का मतलब है कि कोर्ट एक ऐसा सिद्धांत तय कर रहा है जिसका जिक्र अनुच्छेद 329 में नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस व्याख्या को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। यह कहते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
हालांकि कोर्ट ने नटराजन को चुनाव याचिका दाखिल करने की छूट देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में कोर्ट ने केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
किस आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर ने नटराजन का नामांकन किया था निरस्त
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रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने गत नौ जून को मीनाक्षी नटराजन का नामांकन इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उन्होंने नामांकन के साथ दिए गए फार्म 26 के हलफनामे में तेलंगाना की एक अदालत में उनके खिलाफ लंबित निजी शिकायत के केस का ब्योरा नहीं दिया था। नटराजन ने पहले इस संबंध में चुनाव आयोग को ज्ञापन दिया जब चुनाव आयोग से कोई जवाब नहीं मिला तो नटराजन ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी।