डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस बात पर बंटी हुई राय दी कि क्या 2023 के उस कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के समूह को एक बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) को चुनने वाले पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखता है।
पांच जजों की स्थायी संविधान पीठ बनाने की संभावना तलाशने का अनुरोध
पीठ ने सीजेआई से अहम मुद्दों पर फैसला करने के लिए पांच जजों की स्थायी संविधान पीठ बनाने की संभावना तलाशने का भी अनुरोध किया। याचिकाओं के समूह ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी, जो चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखता है।
2 मार्च, 2023 को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाने के उद्देश्य से दिए गए एक अहम फैसले में पांच जजों की संविधान पीठ ने आदेश दिया था कि उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सलाह पर की जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।
पीठ के दूसरे जज न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा राय से सहमत नहीं थे
पीठ की अध्यक्षता करने वाले न्यायमूर्ति दत्ता ने केंद्र की इस दलील को मानने से इनकार कर दिया कि याचिकाएं संवैधानिक महत्व के अहम सवाल उठाती हैं और उन्हें पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। हालांकि पीठ के दूसरे जज न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा उनकी राय से सहमत नहीं थे।
न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, अगर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हैं, तो यह स्पष्ट है कि भारत का चुनाव आयोग न केवल एक स्वतंत्र निकाय होना चाहिए बल्कि उसे स्वतंत्र रूप से काम करते हुए भी दिखना चाहिए।
हालांकि, चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल न करने की सीधी चुनौती के बावजूद 2023 का अधिनियम शायद बच जाए। इसे 'परसेप्शन टेस्ट' (लोगों की नजर में सही होने की कसौटी) पर भी खरा उतरना होगा, जिसे यह कोर्ट बार-बार जरूरी बता चुका है।
याचिकाकर्ताओं की यह दलील प्रथम दृष्टया ठोस लगती है
उन्होंने कहा कि क्या पूरे भरोसे के साथ यह कहा जा सकता है कि 2023 के एक्ट की धारा 7 में बताई गई सिलेक्शन कमिटी उतनी ही आजाद है, जितनी कि 2023 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई प्रो-टेम कमिटी थी?
उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं की यह दलील कि 2023 का कानून एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) को चयन की बहुत ज्यादा शक्तियां देता है और इस तरह संविधान के अनुच्छेद 324 और बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी स्वतंत्रता की छवि को कमजोर करता है, प्रथम दृष्टया ठोस लगती है।