
धीरज बेलवाल, नईदुनिया। राजस्थान की धरती सिर्फ अपनी वीरता के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति अपने अगाध प्रेम के लिए भी पूरी दुनिया में विख्यात है। यहां की रेतीली हवाओं में एक ऐसा संकल्प गूंजता है, जो मरुस्थल की भीषण तपिश में भी जीवों को शीतलता प्रदान करता है। यह संकल्प है बिश्नोई समाज का। वही समाज, जिसने सदियों पहले यह उद्घोष किया था कि "सिर सांटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण" (अर्थात् यदि सिर कटवाकर भी एक पेड़ बचता है, तो इसे सस्ता सौदा ही समझना चाहिए)।
आइए, इस विशेष रिपोर्ट में जानते हैं बिश्नोई समाज की उस परंपरा, उनके रीति-रिवाजों और काले हिरण के प्रति उस दीवानगी की कहानी, जिसने बॉलीवुड के 'सुल्तान' सलमान खान के जीवन की दिशा तक बदल दी।
बिश्नोई समाज की नींव 15वीं शताब्दी में गुरु जम्भेश्वर भगवान (जम्भोजी) ने रखी थी। इस समाज का नाम ही उनके द्वारा दिए गए '29 नियमों' पर टिका है। राजस्थानी भाषा में 'बीस' (20) और 'नो' (9) मिलकर 'बिश्नोई' कहलाते हैं। ये नियम मात्र धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पर्यावरण और जीव रक्षा के वैज्ञानिक सूत्र हैं।
इन नियमों में हरे पेड़ न काटना, जीवों पर दया करना, नशा न करना और सात्विक जीवन जीना मुख्य है। बिश्नोई समाज के लोग हिंदू धर्म के अनुयायी होते हुए भी शवों को जलाते नहीं बल्कि दफनाते हैं, ताकि लकड़ी जलाने के लिए किसी हरे पेड़ की बलि न देनी पड़े।

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बिश्नोई समाज के लिए काला हिरण (Blackbuck) केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि उनके आराध्य गुरु जम्भेश्वर भगवान का अवतार और परिवार का एक हिस्सा है। बिश्नोई गांवों में आपको ऐसे दृश्य मिल जाएंगे जो दुनिया के किसी कोने में दिखाई नहीं देंगे, यहां महिलाएं हिरण के अनाथ बच्चों को अपना दूध पिलाकर पालती हैं।

काले हिरण के प्रति इस अगाध श्रद्धा के पीछे मान्यता है कि गुरु जम्भोजी ने स्वयं जीवों की रक्षा का संकल्प लिया था। बिश्नोई समाज का मानना है कि हिरणों के झुंड में उनके पूर्वजों की आत्माएं निवास करती हैं। यही कारण है कि जब भी किसी काले हिरण का शिकार होता है, तो पूरा समाज इसे अपने परिवार के सदस्य की हत्या के समान मानता है और न्याय के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है।
बिश्नोई समाज की इसी कट्टर जीव रक्षा की भावना ने बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान के जीवन में एक लंबा तूफान खड़ा कर दिया। साल 1998 में फिल्म 'हम साथ साथ हैं' की शूटिंग के दौरान जोधपुर के कांकाणी गांव में दो काले हिरणों के शिकार का मामला सामने आया।

उस रात जब गोलियां चलीं, तो बिश्नोई समाज के लोग अपनी जान की परवाह किए बिना शिकारियों के पीछे दौड़े थे। यह बिश्नोई समाज की ही अटूट पैरवी थी कि देश के सबसे शक्तिशाली अभिनेताओं में से एक को जेल की सलाखें देखनी पड़ीं और दशकों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़े।
यह मामला महज एक कानूनी लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह एक समाज की अपनी आस्था और अपने 'देवता' के प्रति अडिग निष्ठा का प्रमाण था। आज भी लॉरेंस बिश्नोई जैसे नाम जब चर्चा में आते हैं, तो उसके पीछे की जड़ें इसी पुराने 'शिकार प्रकरण' और समाज की आहत भावनाओं से जुड़ी होती हैं।
बिश्नोई समाज का इतिहास बलिदानों से लिखा गया है। सन् 1730 की खेजड़ली की घटना को भला कौन भूल सकता है? जब जोधपुर के महाराजा के आदेश पर पेड़ काटे जा रहे थे, तब अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों ने पेड़ों से चिपक कर अपने प्राण दे दिए थे। यह विश्व का पहला और सबसे बड़ा 'चिपको आंदोलन' था।

आज के दौर में जब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं पूरी दुनिया के लिए खतरा बनी हुई हैं, तब बिश्नोई समाज का जीवन दर्शन एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। यह समाज हमें सिखाता है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक छोटा सा हिस्सा है। काले हिरण और खेजड़ी के प्रति उनका प्रेम यह संदेश देता है कि जब तक हम अपने आसपास के मूक प्राणियों और वनस्पतियों का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक हमारा अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं है।
बिश्नोई समाज आज भी अपनी उसी पुरानी आन-बान और शान के साथ रेगिस्तान के प्रहरी के रूप में खड़ा है, जहां आस्था का रंग काले हिरण की सुरक्षा से और भी गहरा हो जाता है।