
डिजिटल डेस्क। "पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब..." यह कहावत हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं, लेकिन आज भी हमारे देश की लाखों बेटियों के हाथों से किताबें छीनकर, उनके नाजुक कंधों पर घर-गृहस्थी का भारी बोझ लाद दिया जाता है। सपनों को पंख लगाने की उम्र में उन्हें शादी के मंडप में धकेल दिया जाता है।
रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) की ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2024 के विधिक और सांख्यिकीय आंकड़े बताते हैं कि तमाम कड़े कानूनों और जागरूकता अभियानों के बावजूद समाज से बाल विवाह (Child Marriage) का यह कूट डंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
देश में महिलाओं के विवाह की मौजूदा स्थिति को लेकर जारी हुए आंकड़े समाज की सोच पर कूट सवाल खड़े करते हैं। साल 2024 में भारत में जितनी भी महिलाओं की शादियां हुईं, उनका सांख्यिकीय गणित कुछ इस प्रकार है:
अगर राज्यों के स्तर पर इस सामाजिक बुराई का कूट विश्लेषण करें, तो पूर्वी और मध्य भारत के हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं:
| राज्य (States) | बाल विवाह का प्रतिशत (18 साल से कम)** | विधिक एवं कूट स्थिति (Current Status)** |
| पश्चिम बंगाल | 6.3% | पूरे देश में शीर्ष (Top) स्थान पर, स्थिति सबसे गंभीर। |
| झारखंड | 4.9% | देश में दूसरे स्थान पर, ग्रामीण इलाकों में दर अधिक। |
| छत्तीसगढ़ | 2.9% | मध्य भारत का यह राज्य भी औसत से काफी ऊपर है। |
| असम | 2.8% | पूर्वोत्तर राज्यों में सामाजिक सुधारों की गति धीमी। |
| बिहार / ओडिशा | 2.6% | दोनों राज्यों में स्थिति समान रूप से चिंताजनक बनी हुई है। |
| राजस्थान | 2.4% | ऐतिहासिक रूप से बदनाम यह राज्य अब राष्ट्रीय औसत के करीब आ रहा है। |
इस स्याह तस्वीर के बीच देश के कुछ राज्यों ने कूट बदलाव की एक बेहद खूबसूरत और उम्मीद जगाने वाली मिसाल पेश की है:
आमतौर पर माना जाता है कि शहरों में शिक्षा और जागरूकता के कारण बाल विवाह नहीं होते। राष्ट्रीय औसत भी यही कहता है कि ग्रामीण भारत में बाल विवाह 2.4% है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह महज 1.1% है।
लेकिन पश्चिम बंगाल से आए आंकड़े समाजशास्त्रियों को चौंका रहे हैं। बंगाल के ग्रामीण इलाकों में बाल विवाह की दर 5.9% है, जबकि वहां के शहरी इलाकों में यह ग्राफ बढ़कर 7.6% तक पहुंच गया है, जो कि देश के शहरी औसत से सात गुना ज्यादा है। इसके विपरीत, झारखंड के ग्रामीण इलाकों में यह दर 5.8% है।
स्वास्थ्य और विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि बाल विवाह केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि बेटियों के जीवन के साथ एक गंभीर खिलवाड़ है।
(समाचार एजेंसी के इनपुट के साथ)
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