बिहार में 'सम्राट' युग... क्यों भाजपा ने अपने पहले मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी को ही चुना?
बिहार की सत्ता के गलियारों में अब 'पगड़ी' वाले नेता यानी सम्राट चौधरी का नाम गूंज रहा है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने तमाम समीकरणों को तौलने के बाद स ...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 14 Apr 2026 05:20:20 PM (IST)Updated Date: Tue, 14 Apr 2026 05:22:30 PM (IST)
बिहार के नए सीएम सम्राट चौधरीHighLights
- कुशवाहा समाज को साधकर राजद के यादव वोट बैंक को चुनौती देना
- राजद और भाजपा दोनों सरकारों में मंत्री पद संभालने का 30 साल का अनुभव
- नीतीश कुमार के साथ निजी मतभेद भुलाकर गठबंधन को प्राथमिकता देना
डिजिटल डेस्क। बिहार की सत्ता के गलियारों में अब 'पगड़ी' वाले नेता यानी सम्राट चौधरी का नाम गूंज रहा है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने तमाम समीकरणों को तौलने के बाद सम्राट चौधरी के नाम पर अंतिम मुहर लगा दी है। इसके पीछे तीन ऐसे बड़े कारक हैं जिन्होंने नीतीश कुमार और भाजपा हाईकमान दोनों का भरोसा जीतने में मदद की।
1. 'लव-कुश' समीकरण को साधने का मास्टरस्ट्रोक
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की ताकत का आधार 'लव-कुश' (कुर्मी-कुशवाहा) गठबंधन रहा है।
वोट बैंक: राज्य में इस समीकरण का 7% से ज्यादा वोटों पर सीधा असर है। इसमें कोइरी (कुशवाहा) समाज की हिस्सेदारी करीब 4% है, जो 50-60 विधानसभा सीटों पर हार-जीत तय करते हैं।
रणनीति: सम्राट चौधरी खुद कुशवाहा समाज से आते हैं। उन्हें सीएम बनाकर भाजपा ने सीधे तौर पर यादव वोट बैंक के मुकाबले कोइरी समाज को अपने पाले में करने की कोशिश की है। यह एनडीए के लिए भविष्य के चुनावों में एक अभेद्य किला तैयार करने जैसा है।
2. तीन दशकों का लंबा और आक्रामक राजनीतिक अनुभव
सम्राट चौधरी कोई नए चेहरे नहीं हैं, 1990 से सक्रिय उनकी राजनीति कई पड़ावों से गुजरी है...
- शुरुआत और विकास: राजद की राबड़ी सरकार में कृषि मंत्री रहने से लेकर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और फिर डिप्टी सीएम तक, उन्होंने हर भूमिका में अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित की।
- संगठन पर पकड़: मार्च 2023 में प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा। विपक्ष के नेता के तौर पर उनकी आक्रामकता और गठबंधन सरकार में पंचायत राज मंत्री के रूप में उनके काम ने उन्हें एक 'परफॉर्मर' के रूप में स्थापित किया।
3. पारिवारिक विरासत और अपनी पहचान
सम्राट चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है। वे दिग्गज नेता शकुनी चौधरी के बेटे हैं, जो सात बार विधायक और सांसद रहे।
जमीनी जुड़ाव: विरासत मिलने के बावजूद सम्राट ने अपनी पहचान अपने संघर्षों से बनाई। तारापुर से विधायक और विधान परिषद सदस्य के रूप में उनकी सक्रियता ने उन्हें एक जननेता बनाया।
नीतीश कुमार का भरोसा और 'पगड़ी' का त्याग
सबसे दिलचस्प पहलू नीतीश कुमार के साथ उनके रिश्तों का रहा। कभी नीतीश के खिलाफ पगड़ी न खोलने की कसम खाने वाले सम्राट ने गठबंधन के हित में अपनी जिद का त्याग किया।
- बदली रणनीति: उन्होंने नीतीश कुमार को अपना 'अभिभावक' बताकर रिश्तों की बर्फ पिघलाई।
- अनुशासन: दिल्ली में एनडीए की रूपरेखा तय होने के बाद उन्होंने एक अनुशासित सिपाही की तरह कार्य किया। अयोध्या में अपनी पगड़ी समर्पित करना उनके निजी विरोध के अंत और 'सत्ता समन्वय' की शुरुआत का प्रतीक बना, जिससे नीतीश कुमार का उन पर भरोसा बढ़ा।