
धर्म डेस्क। हिंदू धर्मग्रंथों में कलियुग को अधर्म, हिंसा और अज्ञानता का काल बताया गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की भूमि पर एक ऐसा स्थान भी है, जिसके बारे में मान्यता है कि वहां आज भी कलियुग का प्रभाव नहीं है? उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित नैमिषारण्य वह स्थान है, जिसे कलियुग के दोषों से मुक्त माना गया है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के समापन के बाद जब ऋषि-मुनि कलियुग के आगमन को लेकर चिंतित हुए, तब उन्होंने ब्रह्मा जी से मार्गदर्शन मांगा। ऋषियों की चिंता थी कि कलियुग के पाप और कलह के बीच वे अपनी तपस्या कहां सुरक्षित रख पाएंगे।
तब ब्रह्मा जी ने अपने 'मनोमय चक्र' को अंतरिक्ष में छोड़ा और ऋषियों से कहा "यह चक्र जहां जाकर रुकेगा, वही स्थान कलियुग के प्रभाव से मुक्त होगा।" वह चक्र नैमिष वन में जाकर स्थिर हुआ, और तभी से यह भूमि ऋषि-मुनियों की प्रधान तपोस्थली बन गई।
नैमिषारण्य को हिंदुओं का सबसे पहला और पवित्र तीर्थ माना जाता है। इसे 'अष्ट-वैकुंठ' में से एक और 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास स्थान कहा गया है। धार्मिक मान्यता तो यहाँ तक है कि जब तक कोई श्रद्धालु नैमिषारण्य के दर्शन नहीं कर लेता, उसकी चार धाम की यात्रा अधूरी ही मानी जाती है।
शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई साधक इस पवित्र भूमि पर निरंतर 12 वर्षों तक कठिन तपस्या करता है, तो उसे सीधे 'ब्रह्मलोक' की प्राप्ति होती है।
नैमिषारण्य अपनी 84 कोस की परिक्रमा के लिए विश्वविख्यात है, जो फाल्गुन अमावस्या के पश्चात आरंभ होती है। यहां के कण-कण में देवताओं की उपस्थिति मानी जाती है:
Source - उत्तर प्रदेश शासन वेबसाइट
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