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धर्म डेस्क। मध्य प्रदेश को बने 70 साल हो चुके है। आज यह प्रदेश देश के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में गिना जाता है। यहां महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर जैसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग हैं, तो कई ऐसे मंदिर भी हैं जिनकी परंपराएं और उनसे जुड़ी मान्यताएं लोगों को हैरान करती हैं। किसी मंदिर में भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है, तो कहीं साल में केवल एक दिन दर्शन का अवसर मिलता है। एक मंदिर में भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है, तो दूसरे की पहचान उसके हिलते हुए पत्थर से जुड़ी मान्यता है। मध्य प्रदेश स्थापना दिवस के मौके पर जानते हैं प्रदेश के ऐसे ही 10 अनोखे मंदिरों के बारे में।
उज्जैन का काल भैरव मंदिर अपनी अनोखी भोग परंपरा के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां भगवान काल भैरव को मदिरा अर्पित की जाती है। श्रद्धालु बोतलों में मदिरा लेकर मंदिर पहुंचते हैं और उसे भोग के रूप में चढ़ाते हैं। मंदिर में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। भगवान काल भैरव को उज्जैन का रक्षक भी माना जाता है।
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार नागपंचमी के अवसर पर खोले जाते हैं। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव और नाग देवता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में भगवान शिव की नागों से जुड़ी विशेष प्रतिमा स्थापित है। सालभर बंद रहने वाले इस मंदिर के दर्शन को भक्त बेहद खास मानते हैं।
वाड़ी जिले के ओरछा में स्थित राम राजा मंदिर की परंपरा देश के दूसरे मंदिरों से अलग है। यहां भगवान राम को केवल आराध्य नहीं, बल्कि ओरछा के राजा के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में उन्हें राजकीय सम्मान दिया जाता है और पुलिसकर्मियों की ओर से सलामी भी दी जाती है। यहां पूजा-पद्धति में राजदरबार जैसी परंपराओं की झलक दिखाई देती है।
इंदौर के पास कालाकुंड क्षेत्र में स्थित डुगडुगती माता मंदिर अपनी एक स्थानीय मान्यता के कारण चर्चा में रहता है। यहां एक खास पत्थर के हिलने-डुलने को लेकर लोगों के बीच मान्यता प्रचलित है। श्रद्धालु इसे देवी से जुड़ा चमत्कार मानते हैं। मंदिर और आसपास के क्षेत्र की लोककथाएं इसे एक अलग पहचान देती हैं। हालांकि, पत्थर के हिलने के पीछे के कारण को लेकर वैज्ञानिक जांच और स्थानीय लोगों के अनुभवों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
डिंडोरी जिले में स्थित कुकड़ामठ मंदिर प्राचीन शिव मंदिरों में शामिल है। मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यता के अनुसार इसका निर्माण एक ही रात में किया गया था। कहा जाता है कि सुबह होने से पहले इसका शिखर अधूरा रह गया। यह कहानी पीढ़ियों से स्थानीय लोगों के बीच सुनाई जाती है। मंदिर की प्राचीन स्थापत्य शैली भी इसे खास बनाती है।
जबलपुर के भेड़ाघाट में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर अपनी गोलाकार संरचना के लिए जाना जाता है। मंदिर परिसर में योगिनियों की उपासना से जुड़ी प्राचीन परंपरा देखने को मिलती है। ऊंची पहाड़ी पर बने इस मंदिर से नर्मदा नदी और आसपास की प्राकृतिक सुंदरता का दृश्य भी दिखाई देता है। इसकी बनावट और धार्मिक इतिहास इसे मध्य प्रदेश के खास मंदिरों में शामिल करते हैं।
रायसेन जिले के भोजपुर में स्थित भोजेश्वर मंदिर अपनी विशाल शिवलिंग संरचना के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थापित शिवलिंग आकार में बेहद बड़ा है। इस मंदिर का निर्माण परमार राजा भोज के समय से जोड़ा जाता है, लेकिन इसका निर्माण पूरा नहीं हो सका। मंदिर की अधूरी छत और निर्माण से जुड़े पत्थरों के निशान आज भी इतिहास और स्थापत्य कला में रुचि रखने वालों के लिए आकर्षण हैं।
सतना जिले के मैहर में स्थित मां शारदा मंदिर पहाड़ी पर बना प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। इस मंदिर से बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा और ऊदल की लोककथाएं जुड़ी हैं। स्थानीय मान्यता है कि आल्हा मां शारदा के परम भक्त थे और नियमित रूप से उनके दर्शन करने आते थे। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं।
दतिया में स्थित पीतांबरा पीठ मां बगलामुखी की उपासना के लिए प्रसिद्ध है। इसे देश के प्रमुख शक्तिपीठों और साधना केंद्रों में गिना जाता है। यहां विशेष पूजा और अनुष्ठान कराने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर का धार्मिक महत्व मां बगलामुखी की साधना और उनसे जुड़ी मान्यताओं के कारण है।
पन्ना जिले के नचना क्षेत्र में स्थित चौमुखनाथ मंदिर अपनी प्राचीन शिव प्रतिमा के लिए जाना जाता है। यहां भगवान शिव के चार मुखों वाला स्वरूप देखने को मिलता है। मंदिर की प्रतिमा और स्थापत्य कला गुप्तकालीन कला परंपरा की झलक पेश करते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह मंदिर प्राचीन भारतीय मूर्तिकला और इतिहास को समझने का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।