
धर्म डेस्क। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के ग्यारसपुर में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जो करीब 1100 साल से भारतीय इतिहास और स्थापत्य कला की कहानी समेटे हुए है। पहाड़ी की प्राकृतिक चट्टान को काटकर बनाए गए इस मंदिर का नाम माला देवी मंदिर है। यहां जैन तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं, बारीक नक्काशी और अनोखी बनावट देखने को मिलती है। गुर्जर-प्रतिहार काल की कला का नमूना माना जाने वाला यह मंदिर जैन धर्म की ऐतिहासिक विरासत से भी जुड़ा है।
माला देवी मंदिर विदिशा से करीब 38 किलोमीटर दूर ग्यारसपुर की पहाड़ी पर स्थित है। इसका निर्माण नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध यानी लगभग 850 से 900 ईस्वी के बीच माना जाता है। इस हिसाब से मंदिर करीब 1100 साल पुराना है।
इसकी सबसे खास बात इसकी बनावट है। मंदिर का एक हिस्सा पहाड़ की प्राकृतिक चट्टान को काटकर बनाया गया है, जबकि बाकी हिस्सा तराशे गए पत्थरों से तैयार किया गया है। यहां प्रवेश मंडप, सभा मंडप, गर्भगृह और परिक्रमा की व्यवस्था दिखाई देती है। मंदिर के नक्काशीदार स्तंभ, पत्थरों की जालियां और ऊंचा शिखर उस दौर की स्थापत्य कला को दर्शाते हैं।
मंदिर में भगवान शांतिनाथ की पद्मासन मुद्रा में प्रतिमा विशेष महत्व रखती है। इसके साथ हिरण का चिह्न बना है, जो जैन परंपरा में भगवान शांतिनाथ का पहचान चिह्न है। यहां भगवान पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा और प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ से जुड़ी यक्षिणी चक्रेश्वरी की मूर्ति भी मौजूद है। अंबिका और पद्मावती जैसी यक्षिणियों की आकृतियां भी मंदिर की मूर्तिकला को खास बनाती हैं।
जैन धर्म में तीर्थंकरों की पूजा उनके बताए अहिंसा, संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग को याद करने के लिए की जाती है। जैन मंदिरों में सामान्य तौर पर जल, चंदन, अक्षत और दीप अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु दर्शन, मंत्र-जाप और परिक्रमा करते हैं। हालांकि, माला देवी मंदिर में वर्तमान पूजा की नियमित व्यवस्था को लेकर प्रमाणित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
लंबे समय से जर्जर हालत में होने के कारण मंदिर पर्यटकों के लिए बंद बताया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इसकी संरचना को सुरक्षित रखने की तैयारी कर रहा है। योजना के तहत मंदिर के पत्थरों को पहचान और क्रम के साथ खोलकर उनका रिकॉर्ड बनाया जाएगा। इसके बाद उन्हीं पत्थरों को दोबारा लगाकर मंदिर को संरक्षित किया जाएगा।