
धर्म डेस्क। भारतीय संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-अनुष्ठान या स्वागत के समय माथे पर तिलक लगाना एक अनिवार्य परंपरा है। अक्सर देखा जाता है कि तिलक लगवाते समय व्यक्ति अपने सिर पर हाथ रखता है या तिलक लगाने वाला व्यक्ति दूसरे के सिर पर हाथ रखकर तिलक लगाता है।
आम तौर पर इसे केवल एक रस्म माना जाता है, लेकिन प्राचीन शास्त्रों और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार, इस छोटी सी क्रिया के पीछे ऊर्जा प्रबंधन और एकाग्रता का गहरा विज्ञान छिपा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तिलक हमेशा दो भौंहों के बीच स्थित 'आज्ञा चक्र' पर लगाया जाता है। वहीं हमारे शरीर के शीर्ष पर 'सहस्रार चक्र' होता है, जो ऊर्जा का मुख्य केंद्र है। जब तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखा जाता है, तो यह एक प्रकार का 'सर्किट' पूरा करने जैसा काम करता है।
इससे शरीर की सकारात्मक ऊर्जा बाहर निकलने के बजाय वापस भीतर की ओर प्रवाहित होने लगती है, जिससे ऊर्जा का संरक्षण (Energy Conservation) होता है।
वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो जिस स्थान पर तिलक लगाया जाता है, वह पीनियल और पिट्यूटरी ग्लैंड्स (Glands) के अत्यंत समीप होता है। तिलक लगाते समय उंगली या अंगूठे से पड़ने वाला हल्का दबाव इन ग्रंथियों को सक्रिय करता है।
सिर पर हाथ रखने से यह दबाव स्थिर हो जाता है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है, मन शांत रहता है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
तिलक को विजय, सम्मान और सात्विकता का प्रतीक माना गया है। सिर पर हाथ रखना आशीर्वाद देने की मुद्रा भी है। मान्यता है कि तिलक लगाने वाले व्यक्ति की उंगलियों से निकलने वाली सकारात्मक तरंगें तिलक लगवाने वाले के मस्तिष्क में प्रवेश करती हैं, जो उसे आंतरिक शक्ति प्रदान करती हैं।
शीतलता और तनाव मुक्ति - चंदन, कुमकुम या हल्दी का तिलक मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है।
आत्मविश्वास में वृद्धि - शास्त्रों में 'रिक्त भाल' (खाली माथा) को शुभ नहीं माना गया है। तिलक आत्मविश्वास और सकारात्मकता का संचार करता है।
धार्मिक महत्व - यह व्यक्ति के सात्विक होने और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
यही कारण है कि तिलक लगाने की यह विधि सदियों से चली आ रही है, जो न केवल आध्यात्मिक रूप से बल्कि शारीरिक और मानसिक रूप से भी मनुष्य को लाभ पहुँचाती है।