
सुरेंद्र दुबे, नईदुनिया, जबलपुर। भारत की सभ्यता यदि किसी एक सूत्र में पिरोई जा सकती है, तो वह गुरु-शिष्य परंपरा है। यह केवल ज्ञान के हस्तांतरण की व्यवस्था नहीं, बल्कि आत्मा से आत्मा के संवाद की अनश्वर परंपरा है।
गुरु केवल पढ़ाता नहीं, वह मनुष्य का पुनर्जन्म कराता है। वह व्यक्ति के भीतर सोई हुई संभावनाओं को जगाता है और उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
यही क्षण गुरु-तत्त्व के प्रथम प्रकटीकरण के रूप में स्मरण किया जाता है। आगे चलकर यही ज्ञान वेदों, उपनिषदों और दर्शन की विराट धारा बनकर मानवता का पथ आलोकित करता रहा।
महर्षि वेदव्यास ने इस ज्ञान को संकलित कर भारतीय संस्कृति को वह आधार दिया, जिस पर आज भी हमारी सभ्यता खड़ी है। इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
गुरु शब्द का अर्थ ही है, जो अज्ञान के अंधकार का नाश कर ज्ञान का प्रकाश फैलाए। गुरु केवल व्यक्ति नहीं, वह चेतना है। वह दीप है, जो स्वयं जलकर दूसरों का मार्ग प्रकाशित करता है।
भारत की इस महान परंपरा का एक उज्ज्वल अध्याय नर्मदा तट पर भी लिखा गया। आज की संस्कारधानी जबलपुर, जिसे प्राचीन काल में जाबालिपुरम् और त्रिपुरी के नाम से जाना गया, सदियों से ऋषियों, मनीषियों, संतों और आचार्यों की साधना भूमि रही है। यही कारण है कि यहां की मिट्टी में केवल इतिहास नहीं, संस्कार भी सांस लेते हैं।
महर्षि जाबालि का नाम रामायण, पुराणों और उपनिषदों में आदर के साथ आता है। परंपरा कहती है कि उन्होंने नर्मदा तट पर तप किया और उनके गुरुकुल में जाति, वर्ण और वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। शिक्षा का एकमात्र आधार जिज्ञासा थी। यही भारतीय शिक्षा का मूल स्वभाव भी है।
भेड़ाघाट और त्रिपुरी क्षेत्र महर्षि भृगु, जमदग्नि और परशुराम की स्मृतियों से भी जुड़ा रहा। कलचुरी काल में स्थापित गोलकी मठ मध्यकालीन भारत का प्रतिष्ठित शैव एवं तांत्रिक अध्ययन केंद्र बना, जहां देश के विभिन्न भागों से विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे। यह केवल धार्मिक पीठ नहीं, अपने समय का एक महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय था।
आदि शंकराचार्य का नर्मदा से आत्मिक संबंध भारतीय परंपरा में विशेष महत्व रखता है। माना जाता है कि उन्होंने नर्मदा तट पर साधना की और नर्मदा की महिमा का गान किया। अद्वैत दर्शन की उनकी ज्योति आज भी भारतीय चिंतन का शिखर मानी जाती है।
आधुनिक काल में भी यह परंपरा अविराम रही। ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने नर्मदा क्षेत्र को अपनी साधना और मार्गदर्शन से गौरवान्वित किया। उनके शिष्यों की परंपरा आज भी समाज को आध्यात्मिक दिशा दे रही है।
महर्षि महेश योगी ने भावातीत ध्यान को विश्वव्यापी पहचान दिलाई। जबलपुर से उनका आत्मीय संबंध रहा और यहां की धरती ने उनके चिंतन को आकार लेते देखा। आचार्य रजनीश ओशो के शिष्य आज भी विश्व के अनेक देशों में भारतीय चिंतन की एक विशिष्ट धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इतिहासकार डा. आनंद सिंह राणा के अनुसार जबलपुर की पहचान केवल संस्कारधानी के रूप में ही नहीं, बल्कि शिक्षा की राजधानी के रूप में भी विकसित हुई है। यहां विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और उच्च शिक्षण केंद्रों की बहुलता भारतीय ज्ञान परंपरा की निरंतरता का प्रमाण है। यह संयोग नहीं कि जहां ऋषियों की तपस्या हुई, वहीं आधुनिक शिक्षा के दीप भी सर्वाधिक प्रज्वलित हुए।
गुरु पूर्णिमा हमें स्मरण कराती है कि ज्ञान केवल सूचना नहीं, संस्कार भी है। पुस्तकें ज्ञान देती हैं, पर व्यक्तित्व का निर्माण गुरु करता है। डिग्रियां जीवनयापन का साधन बन सकती हैं, किंतु गुरु जीवन का उद्देश्य देता है।
आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीक और सूचना के विस्फोट के दौर से गुजर रही है, तब भी एक सच्चे गुरु का स्थान कोई यंत्र नहीं ले सकता। क्योंकि गुरु केवल उत्तर नहीं देता, वह प्रश्न पूछने की दृष्टि देता है
संस्कारधानी की धरती पर सदियों से प्रवाहित यही गुरु-शिष्य परंपरा भारत की सांस्कृतिक आत्मा है। यह परंपरा हमें बताती है कि सभ्यताएं शस्त्रों से नहीं, शास्त्रों से जीवित रहती हैं