
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर शनिवार को देवशयनी एकादशी मनाई जा रही है। इसी के साथ सनातन धर्म में चार माह तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार माह बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) पर जागृत होते हैं।
इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत सहित सभी मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा, जबकि जप, तप, व्रत, दान, कथा-श्रवण, सत्संग और तीर्थाटन का विशेष महत्व माना जाता है। ज्योतिषाचार्य पं.अमर डब्बावाला ने बताया चातुर्मास आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का काल है।
अनादिकाल से वर्षा ऋतु में ऋषि-मुनि भ्रमण छोड़कर एक ही स्थान पर निवास कर धर्मोपदेश देते थे। चातुर्मास में कल्पवास की परंपरा तभी से चली आ रही है। आज भी संत-महात्मा चातुर्मास में चार माह एक स्थान पर रहकर प्रवचन, भागवत कथा, रामकथा, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं।
चातुर्मास के चार माह श्रावण में शिव भक्ति, भाद्रपद में जन्माष्टमी, श्री गणेश चतुर्थी, अश्विन में पितृपक्ष, नवरात्र, दशहरा तथा कार्तिक में दीपावली से प्रमुख व्रत त्यौहार मनाए जाते हैं। शनिवार से एकादशी व्रत के साथ इसका आरंभ हो जाएगा।
चातुर्मास में आसुरी शक्ति प्रबल हो जाती है
ज्योतिर्विद पं.आनंदशंकर व्यास ने बताया चातुर्मास में सूर्य दक्षिणायन में रहते हैं। इसका अर्थ है पृथ्वी पर सूर्य की किरणें दक्षिण दिशा से आती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार दक्षिण की दिशा असुरों की दिशा है और जब सूर्य का प्रकाश दक्षिण की दिशा से प्राप्त होता है, तो आसुरी शक्ति प्रबल हो जाती है।
इसीलिए देव शक्ति को प्रबलता प्रदान करने के लिए चातुर्मास में जप, तप, व्रत, अनुष्ठा का विशेष महत्व बताया गया है। देवशयनी एकादशी से आने वाले चार माह सनातनी हिन्दू धर्मावलंबियों को धर्म अनुष्ठान करना चाहिए।