
धर्म डेस्क। दिवाली के अगले दिन देश के कई हिस्सों में गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा की जाती है। बिहार और उत्तर भारत के कई ग्रामीण इलाकों में इस अवसर पर घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत, गाय-बछड़े और दूसरी आकृतियां बनाने की परंपरा भी है। इन्हें फूलों, पत्तियों और रंगों से सजाया जाता है। लेकिन सवाल है कि आखिर इस पूजा में गोबर का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इसके पीछे सिर्फ धार्मिक मान्यता है या इसका संबंध हमारी पारंपरिक जीवनशैली से भी है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज के लोग अच्छी वर्षा और समृद्धि के लिए इंद्र देव की पूजा करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि उनके जीवन और आजीविका का आधार गोवर्धन पर्वत, जंगल, गायें और प्रकृति हैं। इसलिए उन्हें प्रकृति और गोवर्धन पर्वत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
इसके बाद ब्रजवासियों ने गोवर्धन की पूजा की। मान्यता है कि इससे क्रोधित होकर इंद्र ने मूसलाधार बारिश की, जिससे लोगों को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। इसी घटना की याद में गोवर्धन पूजा की जाती है। गोबर से पर्वत जैसी आकृति बनाना इसी गोवर्धन स्वरूप का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है।
भारतीय ग्रामीण जीवन में गाय और गोबर का विशेष महत्व रहा है। गाय को धार्मिक रूप से पूजनीय माना जाता है और गोबर का इस्तेमाल लंबे समय से घरों के आंगन, चूल्हे, उपले और खेती में किया जाता रहा है।
परंपरागत रूप से गोबर से आंगन लीपने को शुद्धता और पवित्रता से जोड़ा जाता है। इसी वजह से कई धार्मिक अवसरों पर गोबर से आकृतियां बनाकर पूजा करने की परंपरा विकसित हुई। गोवर्धन पूजा में गोबर से पर्वत, गाय और बछड़ों की आकृतियां बनाना प्रकृति, पशुधन और कृषि के प्रति सम्मान जताने का प्रतीक है।
हालांकि, गोबर से बनी आकृतियों को धार्मिक रूप से पवित्र मानना एक सांस्कृतिक और धार्मिक विश्वास है। इसे किसी बीमारी का इलाज या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित शुद्धिकरण प्रक्रिया नहीं समझना चाहिए।
बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और परिवार गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाते हैं। इसके आसपास गाय, बछड़े और अन्य प्रतीकात्मक आकृतियां भी बनाई जा सकती हैं। इसके बाद फूल, अक्षत और पारंपरिक पूजा सामग्री से पूजा की जाती है। कई जगह अन्नकूट का भोग लगाने की भी परंपरा है।
हालांकि, बिहार के अलग-अलग जिलों और परिवारों में पूजा की विधि और आकृतियों का स्वरूप अलग हो सकता है। कहीं गोबर से पर्वत बनाया जाता है तो कहीं गाय-बछड़ों और कृषि जीवन से जुड़े प्रतीक भी बनाए जाते हैं।
दरअसल, गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस ग्रामीण जीवन की याद भी दिलाती है जिसमें गाय, मिट्टी, पानी, जंगल और खेती एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गोबर से आकृतियां बनाने की परंपरा इसी प्रकृति-केंद्रित सोच का प्रतीक है।
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