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पंढरपुर यात्रा : भगवान विट्ठल से भक्तों के मिलन का महा उत्सव

आषाढ़ी एकादशी को महाराष्ट्र के कोने-कोने से वारकरी संतों की पालकियों एवं दिंडियों (पताकाओं) के साथ पंढरपुर में भगवान विठ्ठल के दर्शन को आते हैं। चारों...और पढ़ें

By ramnath mutkuleEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Sat, 25 Jul 2026 08:56:40 AM (IST)Updated Date: Sat, 25 Jul 2026 01:45:23 PM (IST)
पंढरपुर यात्रा : भगवान विट्ठल से भक्तों के मिलन का महा उत्सव
भगवान विट्ठल और रखुमाई। (एआई इमेज)

HighLights

  1. आषाढ़ी एकादशी को महाराष्ट्र के कोने-कोने से वारकरी संतों की पालकियों एवं दिंडियों के साथ पंढरपुर में भगवान विठ्ठल के दर्शन को आते हैं
  2. चारों ओर से भक्तों का सागर भगवान के दर्शन के लिए उमड़ पड़ता है
  3. ये यात्राएं पैदल सफर तय करते हुए पंढरपुर पहुंचती हैं

रामनाथ मुटकुले, नईदुनिया, इंदौर। आषाढ़ी एकादशी को महाराष्ट्र के कोने-कोने से वारकरी संतों की पालकियों एवं दिंडियों (पताकाओं) के साथ पंढरपुर में भगवान विठ्ठल के दर्शन को आते हैं। चारों ओर से भक्तों का सागर भगवान पंढरीनाथ के दर्शन के लिए उमड़ पड़ता है।

महाराष्ट्र अनेक महान संतों का कर्मक्षेत्र रहा है। इन संतों के जन्म स्थान या समाधि स्थल से ये पालकियां एवं दिंडियां निकलती हैं। ये यात्राएं 200-250 किमी पैदल सफर तय करते हुए पंढरपुर पहुंचती हैं।

ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी आळंदी से पुणे होते हुए, सोपानजी की पालकी सासवड से, निवृत्तिनाथ की पालकी नासिक से, तुकाराम महाराज की पालकी देहू से निकलकर पुणे होते हुए, एकनाथ महाराज की पालकी पैठण से और मुक्ताबाई की पालकी जलगांव से निकलकर पंढरपुर पहुंचती हैं। इनके अतिरिक्त अनेक अन्य साधु-संतों की पालकियां एवं दिंडियां विभिन्न स्थानों से निकलती हैं।


पालकियों में भगवान विठ्ठल-रुखुमाई के चित्रों सहित संतों के चित्र एवं उन संतों के प्रतीकात्मक रूप में रजत पादुकाएं रखी जाती हैं। भक्तजन इन पालकियों के साथ नाचते-गाते, ईश्वर का नाम स्मरण करते हुए एक गांव से दूसरे गांव का सफर तय करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। बीच में पड़ने वाले गांवों में रात्रि विश्राम के लिए यात्राएं रुकती हैं। यहां पर भजन-कीर्तन और ईश्वर के नाम का गजर करते हुए भक्त रात गुजारते हैं।

पालकियों के आगमन का दिन ग्रामीणों के लिए उत्सव समान होता है। वे यात्रियों के लिए भोजन एवं उनके विश्राम की व्यवस्था करते हैं एवं भक्तों की सेवा कर स्वयं को धन्य समझते हैं। सफर के मार्ग में अनेक पदयात्री मिलते जाते हैं और यात्रियों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जाती है।

पंढरपुर पहुंचते ही इन वारकरियों को जन्म सफल होने का आभास होता है। पंढरपुर अर्थात् धरती का वैकुण्ठ। यहां का प्रत्येक कण देवतुल्य माना जाता है। चंद्रभागा नदी के दर्शन मात्र से ही सारे पापों का नाश हो जाता है, ऐसी इन भक्तों की मान्यता है। पंढरपुर में भगवान पंढरीनाथ की स्वयं-भू मूर्ति है। यहां भगवान सिर पर शिवलिंग धारण कर कमर पर हाथ रखे हुए खड़े हैं और अपने भक्तों के इंतजार में नज़रें गड़ाए हुए हैं। अन्य देवस्थानों की भांति यहां उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा, पुष्प इत्यादि नहीं हैं। वे अपने भक्तों को गले लगाने को आतुरता से खड़े हैं। यहां पर भक्त भगवान से आलिंगनबद्ध होकर, फिर उनके चरण-स्पर्श करते हैं जबकि अन्य देवस्थानों पर भगवान के दर्शन बाहर से ही होते हैं।

भगवान के पंढरपुर आगमन की भी एक आख्यायिका है। कहा जाता है कि यहां भगवान संत विठ्ठल रुक्मिणी को साथ लेकर अपने परम भक्त पुंडलिक से मिलने आए, तब पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा में रत थे। मातृ-पितृ भक्त पुंडलिक ने भगवान को सेवा कार्य पूर्ण होने तक इंतजार करने को कहा और उन्हें विश्रांति के लिए एक ईंट फेंककर दी, जो दो टुकड़ों में विभक्त होकर आगे-पीछे जा गिरी। उन टुकड़ों पर भगवान विठ्ठल और रुखुमाई कमर पर हाथ रख अपने भक्त के इंतजार में विराजमान हो गए। इस प्रकार भगवान यहां भक्तों के लिए खड़े हैं।

मराठी लोगों के मन में वारी (तीर्थयात्रा) और पंढरपुर का अत्यधिक महत्व है। काशी-रामेश्वर की यात्रा से अधिक महत्व इनके लिए पंढरपुर यात्रा का है। इस भावना का जिक्र मराठी साहित्यकार और कवियित्री शांता शेळके के शब्दों में—

"माझ्या मराठी मनाचे, आहे पंढरीची नाती।

सुख दुःखा मध्ये मन, माझे पंढरीला जाते।।"

वारकरी संप्रदाय के लोगों के प्रमुख कर्तव्य हैं— शाकाहार, व्रत धारण करते हुए तुलसी के मनकों की माला धारण करना और एकादशी को निराहार रहना। नाथ संप्रदाय के प्रमुख स्तंभ निवृत्तिनाथ के छोटे भाई एवं शिष्य महान संत ज्ञानेश्वर महाराज ने नाथ संप्रदाय के हठ योग को सरल भक्ति मार्ग में परिवर्तित करते हुए वारकरी संप्रदाय के मार्ग पर बल दिया। इसके पश्चात वारकरी संप्रदाय का उदय मुगल आक्रांताओं के अत्याचारों के बावजूद होता गया।

वारी की परंपरा के इतिहास की ठीक-ठीक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

संत शिरोमणि तुकाराम महाराज के आठवें पूर्वज विश्वंभर बाबा जो कि ज्ञानेश्वर महाराज और संत नामदेव के समकालीन थे, इन सभी के घरों में पंढरी की वारी की परंपरा पहले से ही थी। विश्वंभर बाबा ज्ञानेश्वर महाराज एवं संत नामदेव के साथ सहयात्री थे। उन्होंने अपने घर में विठ्ठल-रखुमाई की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की थी, जिससे सारा देहू गांव तीर्थ क्षेत्र सदृश्य बन गया था। इनके वंशजों ने वारी की परंपरा को बदस्तूर जारी रखा। वर्ष 1649 में तुकाराम महाराज के सदेह वैकुंठगमन के पश्चात उनके छोटे भाई कान्होबा ने इस परंपरा को जारी रखा और इसकी जिम्मेदारी उन्होंने तुकाराम महाराज के पुत्र नारायण महाराज को सौंपी। नारायण महाराज को ही वारी को पालकी का स्वरूप प्रदान करने का श्रेय जाता है। सन 1367 के एक शिलालेख में कोकणाधिपति हंबीरराव के नाम के साथ वारकरी का उल्लेख है। पंढरपुर में 16 खंभों के मंडप में वर्ष 1276 के शिलालेख में वारी का उल्लेख अब तक उपलब्ध प्रमाणों में सबसे प्राचीन है।

वारी से आनंदित, उल्लसित लौटते हुए भक्तों से भगवान का क्या कहना है, इसका उल्लेख संत नामदेव ने अपने अभंग में किया है—

"आषाढी कार्तिकी, विसरू नका मज।

सांगतसे गुज, पांडुरंगा।।"

बिछड़ते हुए भक्तों को व्यथित अंतःकरण से भगवान कहते हैं कि वर्ष भर में एक बार मुझसे मिलने ज़रूर आना और मुझे कुछ नहीं चाहिए।

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