
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। खेत की मेड़ पर किसान के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले बैल। कभी हल खींचते हुए तो कभी बोझ उठाते हुए। किसान की मेहनत में जिनके खुरों की आहट भी शामिल रही है, उनके प्रति कृतज्ञता जताने का दिन है पोला।
गुरुवार को जबलपुर के ग्रामीण अंचलों में यह पर्व श्रद्धा, परंपरा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। पोला के दिन किसान कृषि कार्य से विराम लेते हैं। सुबह बैलों को नहलाकर उनका श्रृंगार किया जाएगा। सींगों पर रंग चढ़ेगा, गले में नई रस्सियां और सजावटी सामग्री होगी।
कहीं गुब्बारे सजेंगे तो कहीं बेगड़ और रंग-बिरंगी सामग्री से बैल जोड़ी को आकर्षक रूप दिया जाएगा। इसके बाद उन्हें आखर और मैदान में ले जाकर पूजा-अर्चना की जाएगी। घर की रसोई में भी पर्व की खुशबू होगी। महिलाओं द्वारा विशेष पकवान बनाए जाएंगे और पूजा के बाद इन्हें बैलों को खिलाया जाएगा।
यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस जीव के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा है, जिसने पीढ़ियों तक किसान के साथ खेतों में श्रम किया है। पूजा के बाद परिवार और ग्रामीण एक-दूसरे को तिलक लगाकर पर्व की शुभकामनाएं देंगे।
पोला के अगले दिन नारबोद का पर्व मनाया जाएगा। इसे बुराई को गांव और घर से बाहर करने की लोकपरंपरा के रूप में देखा जाता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में पुतना का पुतला बनाकर उसे घुमाया जाता है। लोग खांसी-खोकला, बीमारी और दूसरी परेशानियों को नारबोद के साथ ले जाने की लोकमान्यता के तहत गांव की सीमा से बाहर पुतले का दहन करते हैं।