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आज मनाया जा रहा है पोला पर्व, बैलों को तिलक, घर-आंगन में पकवान, आखर में होगी पूजा

यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस जीव के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा है, जिसने पीढ़ियों तक किसान के साथ खेतों में श्रम किया है। पूजा के बाद...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Thu, 10 Sep 2026 02:19:59 PM (IST)Updated Date: Thu, 10 Sep 2026 02:26:41 PM (IST)
आज मनाया जा रहा है पोला पर्व, बैलों को तिलक, घर-आंगन में पकवान, आखर में होगी पूजा
पोला पर्व।

HighLights

  1. ग्रामीण अंचलों में पर्व उल्लास के साथ मन रहा है।
  2. पोला के दिन किसान कृषि कार्य से विराम लेते हैं।
  3. बैलों को नहलाकर उनका श्रृंगार किया जा रहा है।

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। खेत की मेड़ पर किसान के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले बैल। कभी हल खींचते हुए तो कभी बोझ उठाते हुए। किसान की मेहनत में जिनके खुरों की आहट भी शामिल रही है, उनके प्रति कृतज्ञता जताने का दिन है पोला।

गुरुवार को जबलपुर के ग्रामीण अंचलों में यह पर्व श्रद्धा, परंपरा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। पोला के दिन किसान कृषि कार्य से विराम लेते हैं। सुबह बैलों को नहलाकर उनका श्रृंगार किया जाएगा। सींगों पर रंग चढ़ेगा, गले में नई रस्सियां और सजावटी सामग्री होगी।


कहीं गुब्बारे सजेंगे तो कहीं बेगड़ और रंग-बिरंगी सामग्री से बैल जोड़ी को आकर्षक रूप दिया जाएगा। इसके बाद उन्हें आखर और मैदान में ले जाकर पूजा-अर्चना की जाएगी। घर की रसोई में भी पर्व की खुशबू होगी। महिलाओं द्वारा विशेष पकवान बनाए जाएंगे और पूजा के बाद इन्हें बैलों को खिलाया जाएगा।

यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस जीव के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा है, जिसने पीढ़ियों तक किसान के साथ खेतों में श्रम किया है। पूजा के बाद परिवार और ग्रामीण एक-दूसरे को तिलक लगाकर पर्व की शुभकामनाएं देंगे।

यह भी पढ़ें: छत्तीसगढ़ में 10 सितंबर को बैल बनेंगे धावक, रेस जीती तो मिलेगा पुरस्कार, राज्य भर में पोला महोत्सव की धूम

नारबोद में निकलेगी बुराई

पोला के अगले दिन नारबोद का पर्व मनाया जाएगा। इसे बुराई को गांव और घर से बाहर करने की लोकपरंपरा के रूप में देखा जाता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में पुतना का पुतला बनाकर उसे घुमाया जाता है। लोग खांसी-खोकला, बीमारी और दूसरी परेशानियों को नारबोद के साथ ले जाने की लोकमान्यता के तहत गांव की सीमा से बाहर पुतले का दहन करते हैं।

बाजार में लौटी पर्व की रंगत

  • दोनों पर्वों को लेकर बाजार भी सज गए हैं। मिट्टी और लकड़ी के नंदी, खिलौने तथा बैलों के श्रृंगार की सामग्री लोगों को आकर्षित कर रही है।
  • गुब्बारे, रंग, बेगड़ और अन्य सजावटी सामान की खरीदारी के लिए ग्रामीण परिवार बाजार पहुंच रहे हैं।
  • आधुनिकता के दौर में भी पोला जब आता है तो जबलपुर के गांवों में किसान और उसके पशु के बीच सदियों पुराना आत्मीय रिश्ता फिर जीवंत हो उठता है।