3 सितंबर को सिंधी समाज मनाएगा ‘थदड़ी’, घरों में नहीं जलेगा चूल्हा, ठंडे पकवान का लगेगा भोग
इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे भोजन का ही सेवन किया जाता है। इसी परंपरा के कारण इस पर्व का विशेष सांस्कृतिक महत...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 02 Sep 2026 06:31:48 PM (IST)Updated Date: Wed, 02 Sep 2026 07:04:51 PM (IST)
सिंधी समाज का पर्व ‘थदड़ी’HighLights
- सिंधी समाज के घरों में इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।
- एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे भोजन का सेवन किया जाता है।
- इसी परंपरा के कारण इस पर्व थदड़ी का विशेष सांस्कृतिक महत्व है।
धर्म डेस्क। सिंधी समाज ‘थदड़ी’ पर्व 3 सितंबर को मनाएगा। इस अवसर पर घर-घर शीतला माता की पूजा-अर्चना कर परिवार के उत्तम स्वास्थ्य, सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना की जाएगी। सिंध रक्षक संगठन के संयोजक नरेश फुंदवानी ने बताया कि यह प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है।
इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे भोजन का ही सेवन किया जाता है। इसी परंपरा के कारण इस पर्व का विशेष सांस्कृतिक महत्व है।
भारतीय सिंधू सभा के युवा शाखा के अध्यक्ष पंकज फतेहचंदानी के अनुसार इसमें कोकी, मीठी कोकी, साईं भाजी, दही, बूंदी, मीठे एवं ठंडे चावल, विभिन्न प्रकार की चटनियां तथा अन्य पारंपरिक व्यंजन प्रमुख रूप से बनाए गए।
![naidunia_image]()
क्या है यह पर्व और क्यों मनाया जाता है
पकवान पर्व को लेकर तरह-तरह की कथाएं प्रचलित हैं। कहते हैं कि पहले जब समाज में तरह-तरह के अंधविश्वास फैले थे तब प्राकृतिक घटनाओं को दैवीय प्रकोप माना जाता था। जैसे समुद्रीय तूफानों को जल देवता का प्रकोप, सूखाग्रस्त क्षेत्रों में इंद्र देवता की नाराजगी समझा जाता था। इसी तरह जब किसी को माता (चेचक) निकलती थी तो उसे दैवीय प्रकोप से जोड़ा जाता था तब देवी को प्रसन्न करने हेतु उसकी स्तुति की जाती थी और थदड़ी पर्व मनाकर ठंडा खाना खाया जाता था।
![naidunia_image]()
ऐसे मनाया जाता है थदड़ी
- रात को सोने से पूर्व चूल्हे पर जल छिड़कर हाथ जोड़कर पूजा की जाती है।
- इस तरह चूल्हा ठंडा किया जाता है। दूसरे दिन 29 अगस्त को पूरा दिन घरों में चूल्हा नहीं जलेगा।
- एक दिन पहले बनाया ठंडा खाना ही खाया जाता है।
- इसके पहले परिवार के सभी सदस्य किसी नदी, नहर, कुएं या बावड़ी पर इकट्ठे होते हैं।
- वहां मां शीतला देवी की विधिवत पूजा की जाती है।
- इसके बाद बड़ों से आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
- बदलते दौर में जहां शहरों में सीमित साधन व सीमित स्थान हो गए हैं।
- ऐसे में पूजा का स्वरूप भी बदल गया है। अब कुएं, बावड़ी व नदियां अपना अस्तित्व लगभग खो बैठे हैं।
- इसलिए आजकल घरों में ही पानी के स्रोत जहां पर होते हैं वहां पूजा की जाती है।
- इस पूजा में घर के छोटे बच्चों को विशेष रूप से शामिल किया जाता है और मां का स्तुति गान कर उनके लिए दुआ मांगी जाती है कि वे शीतल रहें व माता के प्रकोप से बचे रहें।