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नजर न लगे इसलिए नाम रखा 'झंडू', ठेला लगाया, ई-रिक्शा चलाया और बिहार का लाल ने अब दुनिया में लहराया देश का परचम

Success Story: बिहार के नालंदा निवासी पैरा पावर लिफ्टर झंडू कुमार ने ग्लास्गो में पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Sun, 26 Jul 2026 02:38:42 PM (IST)Updated Date: Sun, 26 Jul 2026 02:45:17 PM (IST)
नजर न लगे इसलिए नाम रखा 'झंडू', ठेला लगाया, ई-रिक्शा चलाया और बिहार का लाल ने अब दुनिया में लहराया देश का परचम
ग्लास्गो में झंडू कुमार ने जीता पदक (फोटो- सोशल मीडिया)

HighLights

  1. पोलियो के बावजूद नहीं टूटा हौसला
  2. तीन बार मिला बिहार खेल सम्मान
  3. सरकार उठा रही प्रशिक्षण का खर्च

स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के नालंदा जिले के हैवीवेट पैरा पावर लिफ्टर झंडू कुमार ने ग्लास्गो में पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया है। आर्थिक रूप से बेहद साधारण परिवार से आने वाले झंडू की यह उपलब्धि उनके संघर्ष, मेहनत और लक्ष्य के प्रति समर्पण का प्रतीक बन गई है। कभी परिवार का खर्च चलाने के लिए ठेला लगाने और ई-रिक्शा चलाने वाले झंडू आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का तिरंगा लहरा चुके हैं।

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गरीबी को कभी नहीं बनने दिया कमजोरी

28 वर्षीय झंडू कुमार का जन्म नालंदा के एक निर्धन परिवार में हुआ। उनके पिता रामानंद पासवान और मां कमला देवी सब्जी बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। झंडू भी बचपन से माता-पिता का हाथ बंटाते थे और सब्जी की दुकान पर बैठते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्होंने ठेला और ई-रिक्शा चलाकर भी घर की जिम्मेदारियां निभाईं।


चार साल की उम्र में पोलियो, फिर भी नहीं छोड़ा हौसला

झंडू कुमार चार वर्ष की उम्र में पोलियो के कारण दिव्यांग हो गए थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपनी शारीरिक स्थिति को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, भारी वजन उठाने में रुचि बढ़ती गई और यहीं से उनका रुझान पावर लिफ्टिंग की ओर हो गया। हालांकि उस समय उन्होंने यह नहीं सोचा था कि एक दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करेंगे।

डाइट के लिए बेचना पड़ा ई-रिक्शा और ठेला

झंडू के कोच ने उन्हें बताया कि पावर लिफ्टिंग में आगे बढ़ने के लिए पौष्टिक आहार और बेहतर तैयारी जरूरी है। लेकिन आर्थिक तंगी उनके सामने बड़ी चुनौती थी। ऐसे में परिवार ने बड़ा फैसला लिया और ई-रिक्शा तथा ठेला बेचने की अनुमति दे दी। इन्हें बेचकर मिली रकम से झंडू ने अपनी डाइट और प्रशिक्षण का खर्च पूरा किया। यही त्याग आज उनकी सफलता की बड़ी वजह बना।

नाम रखने के पीछे भी है खास वजह

झंडू कुमार के माता-पिता ने बताया कि उनका नाम किसी योजना के तहत नहीं रखा गया था। परिवार और गांव में यह मान्यता रही है कि बच्चे का ऐसा नाम रखने से उसे नजर नहीं लगती। इसी वजह से उन्हें बचपन से झंडू कहकर पुकारा जाने लगा और यही नाम स्थायी हो गया। आज उनकी उपलब्धि के बाद पूरे देश की नजर इस खिलाड़ी पर है।

सरकार उठा रही प्रशिक्षण का खर्च

झंडू कुमार की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 2024 से उनके प्रशिक्षण और अन्य खर्च का जिम्मा भारत सरकार उठा रही है। बिहार सरकार ने भी समय-समय पर उनकी आर्थिक सहायता की है।

नालंदा लक्ष्य पारा खेल अकादमी के सचिव और उनके कोच कुंदन कुमार पांडेय के अनुसार, झंडू को अब तक तीन बार बिहार खेल सम्मान मिल चुका है। इस सम्मान के तहत उन्हें प्रशंसा पत्र और हर बार दो-दो लाख रुपये की राशि प्रदान की गई।

अब उच्चस्तरीय स्कॉलरशिप और नौकरी की उम्मीद

कोच के अनुसार, झंडू कुमार को बिहार सरकार से खेलवृत्ति भी मिलती रही है। इस बार उनके 20 लाख रुपये की उच्चस्तरीय स्कॉलरशिप के लिए चयनित होने की संभावना है। इसके अलावा, बिहार सरकार की 'पदक लाओ, नौकरी पाओ' योजना के तहत उन्हें लेवल-9 की सरकारी नौकरी दिए जाने की प्रक्रिया भी चल रही है।