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नोएडा हिंसा में HC की टिप्पणी,कहा- लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का मूल अधिकार, डीएम को बताया गैर जिम्मेदाराना

अदालत ने नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के वेतन वृद्धि आंदोलन से जुड़े मामले में छात्रा पर लगाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून भी रद कर दिया।

By Digital DeskEdited By: Nitin Kumar
Publish Date: Tue, 08 Sep 2026 01:32:48 PM (IST)Updated Date: Tue, 08 Sep 2026 01:32:48 PM (IST)
नोएडा हिंसा में HC की टिप्पणी,कहा-  लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का मूल अधिकार, डीएम को बताया गैर जिम्मेदाराना
नोएडा हिंसा को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी (फाइल फोटो)

HighLights

  1. नोएडा हिंसा को लेकर HC की टिप्पणी
  2. लोकतंत्र में विरोध जताना मूल अधिकार
  3. डीएम गौतमबुद्ध नगर को बताया गैर जिम्मेदाराना

डिजिटल डेस्क, प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का कहना है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध करना नागरिकों का मूल अधिकार है। कोई भी नागरिक अपने अधिकार के लिए आवाज उठा सकता है और अपना विरोध दर्ज कर सकता है। यह शासन के लिए 'सेफ्टी वाल्व' की तरह काम करता है, जिसे मनमाने ढंग से दबाया नहीं जा सकता।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण स्वीकार करते हुए की है।

अदालत ने नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के वेतन वृद्धि आंदोलन से जुड़े मामले में छात्रा पर लगाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून भी रद कर दिया। कोर्ट ने पुलिस की कहानी में बड़ा विरोधाभास पाया।

पुलिस की कार्रवाई पर सवाल

गौरतलब है कि, आकृति चौधरी को पुलिस ने 11 अप्रैल 2026 को हिरासत में लिया था, जबकि नोएडा में हिंसा और आगजनी की घटना 13 अप्रैल 2026 को हुई थी। खंडपीठ ने सवाल उठाया कि जो व्यक्ति पहले से हिरासत में है, वह बाद की हिंसा के लिए जिम्मेदार कैसे हो सकता है? पुलिस गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य या वीडियो नहीं पेश कर सकी।


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जिलाधिकारी को बताया गैर जिम्मेदाराना

बीएनएसएस की धारा 130 के तहत दिया गया नोटिस भी गिरफ्तारी के बाद तैयार किया गया औपचारिक दस्तावेज निकला। कोर्ट ने जिलाधिकारी, गौतमबुद्ध नगर द्वारा एनएसए लगाने को अत्यंत क्रूर और गैर-जिम्मेदाराना करार दिया।

आगे अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कड़े निवारक कानूनों का इस्तेमाल सामान्य जमानत रोकने के लिए नहीं किया जा सकता। बिना पुख्ता सबूत के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला हुआ तो अदालतें मूकदर्शक नहीं रहेंगी। लोकतंत्र में पारदर्शिता, मूल अधिकार और निष्पक्षता जरूरी है।

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