डिजिटल डेस्क, प्रयागराज। करीब चार दशक पुरानी पदोन्नति की लड़ाई आखिरकार 85 साल की उम्र में राम अवतार सिंह यादव के पक्ष में खत्म हुई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त दारोगा को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति का लाभ देने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि सेवानिवृत्ति तक पदोन्नत पद के अनुसार मिलने वाले वेतन और अन्य सभी वित्तीय लाभ का भुगतान चार सप्ताह के भीतर किया जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने राम अवतार सिंह यादव की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया।
कनिष्ठों को पदोन्नति मिली, याची को किया गया नजरअंदाज
इटावा निवासी राम अवतार सिंह यादव वर्ष 1999 में थानाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनका कहना था कि विभाग में उनसे कनिष्ठ पुलिसकर्मियों को इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति दे दी गई, लेकिन उनकी पदोन्नति पर विचार नहीं किया गया।
सात प्रतिकूल प्रविष्टियां दर्ज थीं, पांच बार दंडित किया गया
उन्होंने इस संबंध में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के समक्ष प्रत्यावेदन दिया था। हालांकि, छह अप्रैल 2010 को इसे खारिज कर दिया गया। विभाग की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 1973 से 1994 के बीच उनके सेवा अभिलेख में सात प्रतिकूल प्रविष्टियां दर्ज थीं और उन्हें पांच बार दंडित भी किया गया था।
इसके बाद राम अवतार सिंह यादव ने राज्य लोक सेवा अधिकरण का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 30 नवंबर 2012 को उनका दावा खारिज हो गया। समीक्षा याचिका भी 10 जून 2013 को खारिज कर दी गई।
हाई कोर्ट में भी शुरुआती दौर में नहीं मिली राहत
अधिकरण के फैसले के खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन 16 फरवरी 2015 को वह अदम पैरवी में खारिज हो गई। इसके बाद दाखिल रिकॉल यानी पुनर्स्थापना अर्जी भी 11 दिसंबर 2015 को खारिज कर दी गई।
बाद में हाई कोर्ट ने पुनर्स्थापना अर्जी स्वीकार करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई की और पूरे प्रकरण को उसके गुण-दोष के आधार पर परखा।
विभाग रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि डीजीपी के आदेश में यह उल्लेख था कि पदोन्नति के लिए याची का साक्षात्कार हुआ था और उसे अंक भी दिए गए थे। लेकिन विभाग यह रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश नहीं कर सका कि राम अवतार सिंह यादव को कितने अंक मिले और जिन अभ्यर्थियों का चयन हुआ, उन्हें कितने अंक दिए गए। कोर्ट के सामने इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह आया कि विभाग यह साबित नहीं कर सका कि याची की सेवा पुस्तिका में दर्ज प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी उन्हें विधिवत दी गई थी।
‘प्रतिकूल प्रविष्टियों’ के आधार पर पदोन्नति रोकना उचित नहीं
खंडपीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी की पदोन्नति प्रतिकूल प्रविष्टियों के आधार पर रोकने से पहले यह आवश्यक है कि उन प्रविष्टियों की जानकारी संबंधित कर्मचारी को दी जाए। इस मामले में विभाग ऐसा करने में विफल रहा।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन बनाम कटिजी’ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल देरी के आधार पर किसी मामले को न्याय के गुण-दोष पर सुनने से नहीं रोका जाना चाहिए।
जहां वास्तविक और सारभूत न्याय का प्रश्न हो, वहां मामले की सुनवाई उसके मूल तथ्यों के आधार पर की जानी चाहिए।
कोर्ट ने माना, पदोन्नति के मामले में अन्याय और भेदभाव हुआ
अदालत ने माना कि राम अवतार सिंह यादव के साथ पदोन्नति के मामले में अन्याय और भेदभाव हुआ। इसी आधार पर उन्हें 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति का लाभ देने और सेवानिवृत्ति तक के वेतन व अन्य देय लाभ का भुगतान चार सप्ताह में करने का निर्देश दिया गया।