'मैं भूखा हूं, बहुत थक गया हूं', 235 मामलों की भारी लिस्ट के बीच जज का छलका दर्द, सुरक्षित रखा फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने भारतीय न्यायपालिका में न्यायाधीशों पर बढ़ते कार्यभार और मानसिक दबाव की सच् ...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 28 Feb 2026 02:54:48 PM (IST)Updated Date: Sat, 28 Feb 2026 02:54:48 PM (IST)
235 मामलों की भारी लिस्ट के बीच जज का छलका दर्द (प्रतीकात्मक तस्वीर)HighLights
- 235 मामलों की भारी लिस्ट के बीच जज का छलका दर्द
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सुनवाई प्राथमिकता से हुई
- कोर्ट ने मामले का फैसला सुरक्षित रख लिया है
डिजिटल डेस्क। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने भारतीय न्यायपालिका में न्यायाधीशों पर बढ़ते कार्यभार और मानसिक दबाव की सच्चाई को उजागर कर दिया। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी को एक मामले की सुनवाई के दौरान खुली अदालत में यह स्वीकार करना पड़ा कि वह अत्यधिक थकान और भूख महसूस कर रहे हैं, जिसके कारण तत्काल फैसला लिखाना उनके लिए शारीरिक रूप से संभव नहीं है।
यह मामला 'चंद्रलेखा सिंह' द्वारा साल 2025 में ऋण वसूली अधिकरण (DRT) के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा था। हाई कोर्ट ने पूर्व में DRT के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर पलट दिया कि संबंधित पक्ष को पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह 24 फरवरी 2026 तक इस मामले का निस्तारण करे।
235 मामलों की लंबी फेहरिस्त
मंगलवार को न्यायमूर्ति विद्यार्थी की कोर्ट में कुल 235 मामले सूचीबद्ध थे। कार्यभार का आलम यह था कि अपराह्न 4:15 बजे तक वह केवल 29 मामलों की ही सुनवाई कर सके थे। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट की समयसीमा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस विशेष मामले की सुनवाई शुरू की, जो शाम 7:10 बजे तक निरंतर चलती रही।
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जज की मार्मिक टिप्पणी
पूरे दिन की अदालती कार्यवाही और तीन घंटे की लंबी कानूनी बहस के बाद, न्यायमूर्ति ने अपनी शारीरिक असमर्थता व्यक्त की। उन्होंने आदेश में दर्ज किया कि वह स्वयं को "भूखा, थका और शारीरिक रूप से निर्णय लिखाने में अक्षम" महसूस कर रहे हैं। फलस्वरूप, उन्होंने मामले का फैसला सुरक्षित रख लिया।