

डिजिटल डेस्क, लखनऊ। 1857 की क्रांति में ऐसे बहुत से भारतीय राजा हुए जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले एक राजा थे दिग्विजय सिंह, जिन्होंने महज 15 साल की उम्र साल की उम्र में गद्दी संभाली थी। 27 साल की उम्र में वह स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो चुके थे। राजा दिग्विजय सिंह का ऐसा खौफ था कि अंग्रेज छावनी छोड़ भाग खड़े हुए थे।
देश की आजादी में ऐसे बहुत से नायक रहे, जिन्होंने हंसते-हंसते भारत माता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इनमें राजा दिग्विजय सिंह का नाम भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। महोना तालुका के उमरिया गांव में राजा का किला बना था। उनकी पत्नी राजरानी लखीमपुर के धौरहरा राजघराने से थीं, लेकिन इन दोनों को कोई संतान प्राप्ति नहीं हुई। बावजूद इसके राजा ने अपनी वंशावली पर ध्यान न देकर देश की आजादी के लिए अपना फर्ज निभाया।
राजा के अधिकार क्षेत्र में लखनऊ के कुर्सी तहसील में 45 गांव आते थे, लेकिन 1857 में बहुत से गांवों पर अंग्रेजों ने अधिकार जमा लिया था। इसके बाद राजा दिग्विजय सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया। 30 मई को अंग्रेजों की मड़ियांव छावनी में हमला बोल दिया। कई अंग्रेज अफसरों के बंगलों को आग के हवाले कर दिया और संपत्तियों पर कब्जा जमा लिया, जिसके बाद अंग्रेजों को रेजीडेंसी में कैद होने के लिए मजबूर होना पड़ा।
राजा के इस गुस्से और खतरनाक हमले को देखकर अंग्रेज मड़ियांव की छावनी को छोड़कर भाग गए। इस क्रांति के बाद चिनहट और रेजीडेंसी के युद्ध में राजा दिग्विजय सिंह ने अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी थी। स्वाधीनता की इस लड़ाई में राजा ने दो तोपों और 400 योद्धा के साथ लोहे वाले पुल पर गोलीबारी शुरू कर दी, इस हमले में अंग्रेज चीफ कमिश्नर हेनरी लारेंस घायल हो गए थे। इसके बाद इलाज के दौरान अंग्रेज अफसर की मौत हो गई थी। छावनी में आज भी कई तोपों को रखा गया है।
इसके बाद अवध की क्रांति में बख्शी का तालाब (बीकेटी) का भी नाम सामने आता है। एक दिसंबर को बीकेटी की लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर घायल हो गए थे। जवाबी कार्रवाई में अंग्रेजों ने राजा दिग्विजय सिंह को पकड़ने की भरपूर कोशिश की लेकिन उनके हाथ निराशा ही लगी।
जारी युद्ध के बीच जब अंग्रेजों ने दो दिसंबर को राजा के किले पर कब्जा कर लिया तो वह घाघरा नदी को पार कर बेगम हजरत महल से जा मिले। इसके बाद अंग्रेजों से लोहा लेते-लेते नेपाल चले गए, लेकिन 1865 में रसोइया शत्रोहन प्रसाद ने उनके साथ गद्दारी कर दी और अंग्रेजों ने राजा को सीतापुर से गिरफ्तार कर लिया।
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अंग्रेजों ने राजा के खिलाफ मड़ियांव छावनी में अंग्रेजों की हत्या, महोना थाने को फूंकने, टिकैतगंज बाजार पर हमला बोलने, यूरोपियन कैदियों की हत्या सहित कई आपराधिक मुकदमे दर्ज कर दिए। इसके बाद राजा को 25 अक्टूबर 1865 में आजीवन कारावास के लिए काला पानी की सजा हुई। साल 1906 आते-आते राजा दिग्विजय सिंह की मौत हो गई।