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UP Assembly Elections 2027: यूपी में चुनावी संग्राम तेज... बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड और सपा का जातीय समीकरण आमने-सामने

UP Elections 2027:उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गरमाता जा रहा है। BJP हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे पर काम कर रही है,...और पढ़ें

By Akash SharmaEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Sun, 02 Aug 2026 03:07:05 PM (IST)Updated Date: Sun, 02 Aug 2026 03:17:47 PM (IST)
UP Assembly Elections 2027: यूपी में चुनावी संग्राम तेज... बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड और सपा का जातीय समीकरण आमने-सामने
यूपी चुनाव 2027: भाजपा का मास्टर प्लान तैयार (फोटो- सोशल मीडिया)

आकाश शर्मा, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2027) को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, सभी प्रमुख दल अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुट गए हैं। एक ओर भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है, वहीं समाजवादी पार्टी (SP) जातीय समीकरणों के आधार पर PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर भरोसा जता रही है।

बीजेपी का हिंदुत्व और विकास पर फोकस

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी कानून व्यवस्था, सुरक्षा और विकास को प्रमुख मुद्दा बना रही है। सरकार ‘जय श्री राम’ और ‘सनातन’ जैसे सांस्कृतिक नारों के साथ हिंदुत्व की धार को मजबूत करने में जुटी है। प्रदेश में सड़क कनेक्टिविटी, जेवर एयरपोर्ट और गंगा एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजनाओं को भी चुनावी मुद्दा बनाया जा रहा है। बीजेपी और उसके वैचारिक संगठन गांव-गांव तक पहुंचकर “हिंदू सर्वप्रथम” अभियान चला रहे हैं और बड़े स्तर पर हिंदू सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी है।


सपा का PDA फॉर्मूला एक्टिव

समाजवादी पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह 2027 चुनाव में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ उतरेगी। 2024 लोकसभा चुनाव में इस रणनीति से पार्टी को फायदा मिला था। इससे BJP को नुकसान उठाना पड़ा। अब सपा इसी समीकरण को और मजबूत करने के लिए बड़े नेताओं की घर वापसी और सामाजिक गठजोड़ पर काम कर रही है।

बसपा का डीएमओ और सामाजिक गठजोड़

बहुजन समाज पार्टी भी अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को मजबूत करने के साथ मुस्लिम और ओबीसी वर्गों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। सियासी जानकारों की मानें तो बसपा के इस प्रयास से राज्य में त्रिकोणीय मुकाबला और दिलचस्प होने की संभावना है।

जातीय जनगणना बना बड़ा चुनावी मुद्दा

जातीय जनगणना का मुद्दा भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। बीजेपी के इस कदम को विपक्ष के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। सपा और कांग्रेस इस मुद्दे के जरिए पिछड़े और दलित वर्ग को साधने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन बीजेपी ने इसे अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीति बनाई है। साथ ही, सहयोगी दलों जैसे अनुप्रिया पटेल, ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद की मांगों को भी ध्यान में रखा गया है।

‘योगी की पाती’ जनता से सीधा संवाद

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो योगी आदित्यनाथ की ‘योगी की पाती’ केवल एक सरकारी संदेश नहीं, बल्कि जनता से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश है। इस पत्र के जरिए उन्होंने युवाओं, महिलाओं, किसानों और गरीब वर्ग को जोड़ने का प्रयास किया है।

AI, रोजगार, महिला सशक्तिकरण और विकास योजनाओं का जिक्र कर सरकार ने यह संकेत दिया है कि वह भविष्य की जरूरतों के साथ आगे बढ़ रही है। इसे 2027 विधानसभ चुनाव से पहले जनता के बीच भरोसा मजबूत करने और अपनी उपलब्धियों को पहुंचाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं।

बदलता वोटिंग पैटर्न एक नई चुनौती

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले जातीय समीकरणों का वर्चस्व था, लेकिन 2014 और 2017 के बाद वोटिंग पैटर्न में बदलाव देखने को मिला। अब चुनाव अधिकतर ध्रुवीकरण के आधार पर लड़े जा रहे हैं, जिससे मुस्लिम वोट बैंक का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। ऐसे में 2027 का चुनाव हिंदुत्व बनाम जातीय समीकरण की सीधी लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में देखना ये होगा कि यूपी में हिंदुत्व कार्ड जीतता है या जातीय कार्ड।