ईरान में नए युग की शुरुआत, खामेनेई के बेटे मोजतबा संभालेंगे देश का सबसे शक्तिशाली पद
अमेरिका और इजरायली हमलों में अयातुल्ला अली खामनेई की मौत के बाद ईरान ने अपना नया सुप्रीम लीडर चुन लिया है। अली खामनेई के बेटे मोजतबा खामनेई को उत्तराध ...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 09 Mar 2026 06:36:04 AM (IST)Updated Date: Mon, 09 Mar 2026 06:38:25 AM (IST)
ईरान ने मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर घोषित किया। (रॉयटर्स)HighLights
- ईरान ने अपना नया सुप्रीम लीडर चुन लिया है
- मेजेतबा खामनेई बने ईरान के नए सुप्रीम लीडर
- आसान नहीं होगी मेजेतबा खामनेई की राह
वर्ल्ड डेस्क। अमेरिका और इजरायली हमलों में अयातुल्ला अली खामनेई की मौत के बाद ईरान ने अपना नया सुप्रीम लीडर चुन लिया है। अली खामनेई के बेटे मोजतबा खामनेई को उत्तराधिकारी घोषित किया गया है। मोजतबा को पहले से ही इस दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा था, लेकिन उनके लिए सत्ता की राह कांटों भरी होने वाली है।
आम जनता का समर्थन काफी घटा
विश्लेषकों का मानना है कि 1979 की इस्लामी क्रांति के समय जो व्यापक जनसमर्थन शासन के पास था, वह अब भ्रष्टाचार, दमनकारी नीतियों और आर्थिक कुप्रबंधन के कारण काफी घट गया है। हालांकि, शासन के प्रति वफादार 'बसीज' मिलिशिया और सुरक्षा तंत्र का एक मजबूत वर्ग अब भी मौजूद है, जो नए नेतृत्व के लिए जान देने का दावा करता है। जानकारों के अनुसार, यही संगठित नेटवर्क किसी भी बाहरी शासन परिवर्तन की कोशिश को कठिन बना सकता है।
इजरायली विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
इजरायल के अमेरिका में पूर्व राजदूत माइकल ओरेन ने कहा है कि इस सत्ता परिवर्तन पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि जब तक ईरान की वर्तमान वैचारिक सत्ता संरचना में बुनियादी बदलाव नहीं होता, तब तक क्षेत्र में शांति की उम्मीद करना कठिन है। ओरेन के अनुसार, ईरानी नेतृत्व की जिहादी सोच और क्षेत्रीय वर्चस्व की महत्वाकांक्षा इतनी गहरी है कि वे स्वेच्छा से बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम या सशस्त्र समूहों को समर्थन देना बंद नहीं करेंगे।
कमजोर हुआ है ईरान का बुनियादी ढांचा
लगातार युद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरान का बुनियादी ढांचा कमजोर हुआ है। यदि आर्थिक गिरावट जारी रहती है, तो शासन के लिए अपने पारंपरिक समर्थक आधार को बनाए रखना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाएगा। नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामनेई के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक तरफ अपनी वैचारिक पहचान बचाना और दूसरी तरफ देश को पूरी तरह बिखरने से रोकना होगा।
(समाचार एजेंसी रॉयटर्स के इनपुट के साथ)