
डिजिटल डेस्क। अपनी बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक पहचान के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध सिंगापुर में एक नया और महत्वपूर्ण सामाजिक-जनसांख्यिकीय बदलाव दर्ज किया गया है। 'सिंगापुर जनरल हाउसहोल्ड सर्वे' के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, बीते पांच वर्षों के दौरान देश के धार्मिक ताने-बाने में उल्लेखनीय परिवर्तन देखे गए हैं।
इस व्यापक सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि जहां देश में पारंपरिक रूप से स्थापित कई मुख्य धर्मों के अनुयायियों के अनुपात में गिरावट आई है, वहीं दूसरी ओर हिंदू समुदाय और किसी भी धर्म का पालन न करने वाले नास्तिक लोगों के आंकड़े में बढ़ोतरी हुई है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 15 वर्ष तथा उससे अधिक आयु वर्ग की जनसंख्या में हिंदू ही ऐसा एकमात्र मुख्य धार्मिक समूह है जिसके अनुयायियों के प्रतिशत में पिछले पांच सालों में वृद्धि दर्ज की गई है।
इसके विपरीत, बौद्ध, इस्लाम, ताओ और ईसाई धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाली आबादी के अनुपात में कमी आई है। आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक 1.8 प्रतिशत की गिरावट ईसाई धर्मावलंबियों में देखी गई है, जबकि ताओ धर्म के अनुयायियों में 1.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
इस सामाजिक परिवर्तन का सबसे ध्यान खींचने वाला पहलू यह है कि धर्म से दूरी बनाने वाले अथवा किसी भी संप्रदाय से खुद को न जोड़ने वाले लोगों का ग्राफ सबसे तेजी से ऊपर गया है।
सिंगापुर नेशनल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर जैक चिया का मानना है कि इस नई प्रवृत्ति का सीधा अर्थ यह है कि वर्तमान में सिंगापुर का लगभग हर चौथा व्यक्ति ऐसा है जिसकी कोई निश्चित धार्मिक पहचान नहीं है।
सर्वेक्षण रिपोर्ट में हिंदू आबादी के अनुपात में हुई इस बढ़ोतरी के पीछे दो प्रमुख वजहें बताई गई हैं:
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आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि अपने मूल धर्म को न छोड़ने और जीवनभर उसी परंपरा से जुड़े रहने के मामले में हिंदू समुदाय सबसे आगे है।