
डिजिटल डेस्क, सियोल। इंसान जिस गहरे समंदर की गहराइयों तक आज तक खुद नहीं पहुंच सका, वहां उसका फैलाया प्लास्टिक प्रदूषण पहले ही पहुंच गया है। एक नए और चौंकाने वाले शोध में यह खुलासा हुआ है कि समुद्र की सतह से 2,000 मीटर (6,500 फीट) से अधिक की गहराई में रहने वाले जीव भी अब माइक्रोप्लास्टिक के शिकार हो चुके हैं।
दुनिया का लगभग 90 प्रतिशत समुद्री पर्यावरण गहरे समुद्र में है, लेकिन इस हिस्से पर प्रदूषण के असर को लेकर अब तक बेहद कम जानकारी थी। हाल ही में कोरिया रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ बायोसाइंस एंड बायोटेक्नोलॉजी (KRIBB) और कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (KIOST) के वैज्ञानिकों ने मिलकर दुनिया का पहला ऐसा तुलनात्मक अध्ययन किया है, जो 'वॉटर रिसर्च' जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिकों ने दक्षिण-पश्चिम प्रशांत महासागर के 'नॉर्थ फिजी बेसिन' और हिंद महासागर की 'सेंट्रल इंडियन रिज' में स्थित हाइड्रोथर्मल वेंट्स से घोंघों और सीपियों के नमूने एकत्र किए। जांच में सामने आया कि 92 प्रतिशत जीवों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद था, जिसमें प्रति जीव औसतन 3.42 कण पाए गए। इनमें सबसे अधिक मात्रा पॉलीस्टाइनिन की थी, जिसका उपयोग पैकेजिंग और उपभोक्ता उत्पादों में होता है।
अध्ययन में पाया गया कि जीवों की खान-पान की आदतें उनके शरीर में प्लास्टिक जमा होने की जगह तय करती हैं। सतह को खुरचकर खाने वाले घोंघों के पाचन तंत्र में प्लास्टिक मिला, जबकि पानी को छानकर खाने वाली सीपियों के पूरे शरीर के ऊतकों में यह समान रूप से फैला था।
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शोध में दोनों महासागरों के बीच एक बड़ा अंतर भी देखा गया। हिंद महासागर के जीवों में प्रशांत महासागर के मुकाबले वजन के अनुपात में 14.7 गुना अधिक माइक्रोप्लास्टिक पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, तटीय आबादी, नदियों के बहाव और समुद्री धाराओं के कारण यह क्षेत्रीय अंतर आया है। यह अध्ययन भविष्य में गहरे समुद्र के संरक्षण के लिए नीतियां बनाने में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य साबित होगा।