
डिजिटल डेस्क। पश्चिम एशिया के मौजूदा तनावपूर्ण माहौल के बीच आज भी एक ऐसे नाम की चर्चा होती है जिसने आधुनिक छापामार युद्ध और आतंकवाद की परिभाषा बदल दी थी। वह नाम है इमाद मुगनिया। जिसे दुनिया की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसियां 'भूत' (The Ghost) कहती थीं, क्योंकि वह न कभी टीवी पर दिखा और न ही कभी सार्वजनिक भाषण दिया, लेकिन उसके नाम की गूँज वाशिंगटन से तेल अवीव तक सुनाई देती थी।
1962 में लेबनान के एक साधारण परिवार में जन्मा मुगनिया गृहयुद्ध की आग में तपकर बड़ा हुआ। शुरुआती दिनों में यासीर अराफात के साथ काम करने के बाद, उसने 1980 के दशक में हिजबुल्लाह के गठन में रीढ़ की हड्डी के रूप में काम किया। अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के रिकॉर्ड बताते हैं कि 11 सितंबर 2001 के हमलों से पहले, मुगनिया वह शख्स था जिसके हाथों पर सबसे ज्यादा अमेरिकी नागरिकों का खून लगा था।
मुगनिया को पकड़ने के लिए मोसाद और CIA ने 20 साल तक जाल बुना, लेकिन वह हर बार अपनी चालाकी से निकल भागता था:
मुगनिया सिर्फ लेबनान तक सीमित नहीं रहा। उसने अर्जेंटीना में इजरायली दूतावास पर हमला (1992) और AMIA सेंटर विस्फोट (1994) जैसे बड़े ऑपरेशनों को अंजाम दिया। उसने ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के साथ मिलकर एक ऐसा ग्लोबल नेटवर्क बनाया जो एशिया से लेकर लातिन अमेरिका तक फैला हुआ था।
फरवरी 2008 में मुगनिया की किस्मत ने उसका साथ छोड़ दिया। वह सीरिया की राजधानी दमिश्क के काफर सूसा इलाके में अपनी पहचान छिपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी करवाकर रह रहा था। वह इतना सतर्क था कि सीआईए और मोसाद ने उसे खत्म करने के लिए महीनों तक उसकी दिनचर्या की रेकी की।
एक बार वह कासिम सुलेमानी के साथ देखा गया था। दोनों को साथ मारने का मौका था, लेकिन जोखिम को देखते हुए एजेंसियों ने संयम बरता। आखिरकार, जब मुगनिया अपनी कार की ओर बढ़ा, तो एक कार में छिपाए गए 'रिमोट कंट्रोल बम' ने उसे उड़ा दिया। इसे खुफिया इतिहास का सबसे 'क्लीन ऑपरेशन' माना जाता है क्योंकि इसमें किसी निर्दोष की जान नहीं गई।
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मुगनिया की मौत के 16 साल बाद (2024 में), इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट ने इस ऑपरेशन में अपनी भूमिका स्वीकार की। हालांकि मुगनिया मारा गया, लेकिन उसकी युद्धनीति आत्मघाती हमले और वैश्विक नेटवर्क आज भी कई उग्रवादी संगठनों का आधार है।
मुगनिया का अंत यह सबक देता है कि खुफिया दुनिया में एक 'लक्ष्य' को खत्म करने में दो दशक लग सकते हैं, लेकिन उसके द्वारा स्थापित तंत्र और कट्टरपंथी विचारधारा को जड़ से मिटाना आज भी दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।