
वर्ल्ड डेस्क। बाल्टिक सागर की बर्फीली गहराइयों में छिपा एक जहाजी मलबा अब 19वीं सदी की ब्रूइंग परंपराओं के इतिहास को दिखा रहा है। फिनलैंड के दक्षिण में स्थित Åland Islands के पास समुद्र की लगभग 50 मीटर गहराई में एक स्कूनर मिला है, जिसमें वैज्ञानिकों ने 170 साल पुराने बीयर की बोतलें बरामद कीं।
यह जहाज 1840 के दशक में डूबा था। मलबे से 150 से अधिक शैम्पेन और पांच बीयर की बोतलें मिलीं, जिनमें से कुछ पूरी तरह सीलबंद थीं। समुद्र के भीतर लगभग दो शताब्दियों तक सुरक्षित रहने के बाद इन बोतलों की वैज्ञानिक जांच की। उन्होंने पाया कि इन बोतलों में बंद शराब में रासायनिक बदलाव हुआ है। यह उस दौर की ब्रूइंग तकनीकों का सबूत दे रही हैं।
यह खोज वर्ष 2010 की गर्मियों में हुई, जब गोताखोरों ने Baltic Sea में Åland Islands के दक्षिण में डूबे जहाज के अवशेषों की पहचान की। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि यह पोत 1840 के दशक में डूबा। हालांकि इसका नाम, कहां से आया और अंतिम बंदरगाह की जानकारी नहीं मिल पाई है। बरामद की गई पांच बीयर बोतलों में से एक को सतह पर लाते समय दरार आ गई। उसमें से झागदार शराब निकली, जिसे गोताखोरों ने समुद्री पानी मिलने के बावजूद बीयर जैसा बताया।
दो बीयर बोतलों का विस्तृत रासायनिक परीक्षण VTT Technical Research Centre of Finland और Technical University of Munich के वैज्ञानिकों ने किया। अध्ययन के नतीजे Journal of Agricultural and Food Chemistry में प्रकाशित हुए। जांच से पता चला कि दोनों बोतलों में अलग-अलग प्रकार की बीयर थी, जिनमें हॉप्स (लुपुलिन) और फ्लेवर अलग थे।
शोधकर्ताओं ने पाया कि 1840 के दशक में प्रयुक्त हॉप्स में कुछ कड़वे अम्ल आज की तुलना में अधिक मात्रा में मौजूद थे। नमूनों में पाए गए ऑर्गेनिक एसिड, ग्लूकोज और कार्बोनिल यौगिकों से संकेत मिला कि लंबे समय तक बैक्टीरिया और एंजाइम गतिविधि जारी रही। दिलचस्प बात यह रही कि इतने वर्षों बाद भी इसमें मौजूद फ्लेवर आज की बीयर के समान ही है।
विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों बीयर अलग-अलग हॉप बैच से बनी थीं। अधिक हॉप्स वाली बीयर ताज़ा अवस्था में अधिक कड़वी रही होगी, जबकि दूसरी अपेक्षाकृत हल्की रही होगी। फिनोलिक यौगिकों की समानता से संकेत मिलता है कि कुछ फ्लेवर तत्व समय के साथ भी स्थिर रहे।